





डॉ अर्चना गोदारा
समाज एक ऐसा सुनहरा दर्पण है, जिसमें मानव-चरित्र की छवियाँ प्रतिबिम्बित होती हैं। यदि समाज रूपी इस दर्पण पर उजास की किरणें पड़ती हैं तो वह संस्कृति और सदाचार का प्रकाश लौटाता है, किन्तु जब उस पर अंधकार की छाया आ जाती है, तब अपराध, अन्याय, असन्तुलन और अव्यवस्था के दृश्य उभर के आते हैं। वर्तमान समय में यही अंधकार समाज पर गहराता दिखाई दे रहा है। विशेषकर भारतीय समाज , जहाँ अपराधों की बढ़ती संख्या हमारे युग की सबसे बड़ी विडम्बना बन चुकी है।

अपराध का बीज प्रायः उसी भूमि में पनपता है जहाँ आर्थिक विषमता, अशिक्षा और बेरोज़गारी का एक बड़ा सा मरुस्थल पसरा हो। आज के युवा जब अपनी योग्यताओं के अनुरूप अवसर प्राप्त नहीं कर पाते या परिश्रम के बावजूद उनके जीवन-यापन की राह कठिन हो जाती है, तब वे निराशा के गर्त में गिरकर अनुचित मार्ग की ओर अग्रसर होने का प्रयास करते हैं जबकि कुछ तो अग्रसर हो जाते हैं। यह मार्ग उन्हें क्षणिक सुख भले ही दे, परन्तु समाज के लिए यह स्थिति लंबे समय तक बहुत ही घातक सिद्ध होती है।

अपराध बढ़ने का एक कारण उपभोक्तावाद की संस्कृति भी है। क्योंकि आज सफलता का मापदण्ड चरित्र या ज्ञान नहीं, बल्कि भौतिक वैभव बन गया है। लोग यह भूल बैठे हैं कि धन साधन है, साध्य नहीं। भव्य भवन, चमचमाती गाड़ियाँ और तड़क-भड़क से भरे जीवन की लालसा ने मनुष्यों को बहुत ही अधीर और असंयमी बना दिया है। जब वैध मार्ग से इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं, तो लोग अपराध की राह पकड़ लेते हैं। संयुक्त परिवारों की परम्परा, जो अनुशासन और संस्कार का पाठ पढ़ाती थी, अब धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है।

एकल परिवारों में बच्चे जहाँ स्वतंत्रता पाते हैं, वहीं आवश्यक अनुशासन और नैतिक मार्गदर्शन से वंचित रह जाते हैं। परिणामस्वरूप उनका व्यक्तित्व असंतुलित होकर समाज-विरोधी गतिविधियों की ओर बड़ी ही सरलता से मुड़ जाता है। इसलिए अब नशाखोरी, अशिक्षा और राजनीति का अपराधियों से गठजोड़ समान्य व्यवहार बनता जा रहा है। अभी हाल ही में रिल पर एक वीडियो प्रचलित हो रहा है जिसमें माता-पिता अपने लगभग चार-पांच साल के बच्चे के साथ हैं तथा दोनों ही नशे में धूत हैं। वे दोनों ही अपने आप को संभाल नहीं पा रहे हैं और सड़क पर किसी वाहन का इंतजार कर रहे हैं।

एक अन्य उदाहरण ऐसी लड़की का है जिसे मारकर फेंक दिया गया तथा उसके शरीर के कुछ अंगों को निकाल लिया गया। जब समाज में ऐसे दृश्य दिखाई देने लगते हैं तब समाज के वातावरण और माता-पिता की परवरिश पर बड़े सवाल खड़े होते हैं। जब लगभग प्रत्येक दिन समाचारों में कत्ल, बलात्कार और अपहरण जैसी सूचनाएं सुनने और पढ़ने को मिलती हैं तब मन में असुरक्षा के भाव उत्पन्न होने लगते हैं।

ऐसे मे जब अपराधियों को दण्ड की बजाय संरक्षण मिलता है, तो अपराध केवल बढ़ता ही नहीं, बल्कि वैधता का वस्त्र भी ओढ़ लेता है। मीडिया और इंटरनेट के माध्यम से फैली हुई हिंसा और अश्लीलता भी संवेदनशील मनों को दिग्भ्रमित करती है।
समस्या का समाधान केवल कठोर क़ानूनों में नहीं छिपा है, बल्कि सामाजिक और नैतिक पुनर्जागरण में निहित है। शिक्षा व्यवस्था को ऐसा बनाना होगा जो केवल मात्र नौकरी का साधन न हो, बल्कि जीवन मूल्यों का संवाहक भी बने। युवाओं को रोजगार और सही दिशा मिले, समाज में संस्कार और अनुशासन का वातावरण निर्मित हो तथा राजनीति अपराधियों से मुक्त हो, तभी इस विकराल समस्या पर अंकुश लगाया जा सकेगा।

अपराधों की वृद्धि केवल विधि-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक चेतना की दुर्बलता का परिणाम है। यदि हम समवेत प्रयास करें और समाज को नैतिकता तथा संवेदनाओं के आलोक से आलोकित करें, तो अपराध अंधकार का यह मायाजाल स्वयं ही छिन्न-भिन्न हो जाएगा।
मुश्किल है पर असंभव नहीं,
सोते हुए समाज को जगाना।
मुश्किल है अपने आप को जगाना
आओ थोड़ी कोशिश करे, मानवता को सम्भव करें।
-लेखिका एनएमपीजी कॉलेज हनुमानगढ़ में सहायक आचार्य हैं




