




भटनेर पोस्ट डेस्क.
मानसून की सक्रियता से मौसम सुहावना है लेकिन आमजन की रसोई में कोहराम मचा है। सब्जियों के आसमान छूते दामों ने मध्यमवर्गीय और निम्न आय वर्ग के परिवारों को बुरी तरह प्रभावित किया है। पहले जो 200 रुपये की थैली से रसोई भर जाती थी, अब वह 600 रुपये में भी अधूरी लगने लगी है। बाजार की हालत यह है कि टमाटर 80 रुपये प्रति किलो, शिमला मिर्च 120 रुपये और भिंडी 70 रुपये किलो तक बिक रही है। रसोई के इस संकट ने हर घर में बजट की चूलें हिला दी हैं।
हनुमानगढ़ की सब्जी मंडियों से लेकर मोहल्लों तक इन दिनों महंगाई की गूंज सुनाई दे रही है। बारिश के कारण आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधा, सब्जियों की बर्बादी, और परिवहन लागत में बढ़ोतरी ने इस स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। सब्जी विक्रेताओं का कहना है कि बारिश के चलते मंडियों तक सब्जियां समय पर नहीं पहुंच पा रहीं, और जो आ भी रही हैं, उनमें से लगभग 25 प्रतिशत खराब हो रही हैं। इससे न केवल आपूर्ति पर असर पड़ा है, बल्कि खराब माल के कारण उन्हें आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ रहा है।

स्थानीय निवासी प्रभाकर चौधरी, जो हाउसिंग बोर्ड क्षेत्र में रहते हैं, कहते हैं, ‘हर हफ्ते सब्जियों की खरीददारी का खर्च दुगुना हो गया है। सब्जी वाले भी लाचार हैं, हम भी। अब तो आलू-प्याज से ही गुजारा करना पड़ रहा है।’ उनकी यह बात सिर्फ एक घर की नहीं, बल्कि हजारों घरों की कहानी है। जिन रसोइयों में हर दिन तीन से चार तरह की सब्जियां बनती थीं, वहां अब दाल, सोया और आलू-प्याज जैसे विकल्पों से काम चलाया जा रहा है। खासकर दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक, घरेलू कामकाजी महिलाएं और पेंशनधारी वृद्धजन इस बढ़ती महंगाई से सबसे अधिक परेशान हैं।

वर्तमान में हनुमानगढ़ की सब्जी मंडियां बेंगलुरु, हिमाचल प्रदेश और अन्य बाहरी राज्यों से सब्जियां मंगवा रही हैं। गोभी और मटर हिमाचल प्रदेश से आ रही हैं, जबकि खीरा, भिंडी, शिमला मिर्च और टमाटर जैसी सब्जियों की सप्लाई दक्षिण भारत से हो रही है। लम्बी दूरी की वजह से किराया ज्यादा है और यही बढ़ा हुआ खर्च खुदरा बाजार में सीधे भावों में जुड़ जाता है।
सब्जियों के मौजूदा बाजार भाव
टमाटर: ₹80 प्रति किलोग्राम
प्याज: ₹30 प्रति किलोग्राम
शिमला मिर्च: ₹120 प्रति किलोग्राम
भिंडी: ₹60दृ70 प्रति किलोग्राम
तोरी: ₹60 प्रति किलोग्राम
खीरा: ₹60 प्रति किलोग्राम
इन कीमतों ने आम आदमी की थाली को हल्का कर दिया है। बच्चों के टिफिन से लेकर बुजुर्गों की पौष्टिक जरूरतें अब आलू-प्याज और दालों के सहारे चल रही हैं। महंगाई की इस मार से केवल ग्राहक ही नहीं, बल्कि विक्रेताओं की भी हालत पतली हो गई है। स्थानीय सब्जी विक्रेता शत्रुघ्न प्रसाद बताते हैं, ‘बारिश की वजह से खेतों से सब्जियां समय पर नहीं आ पा रही हैं। जो माल आता है, उसका एक बड़ा हिस्सा खराब हो जाता है। ऊपर से डीज़ल और भाड़ा महंगा हो गया है। ग्राहक पहले की तरह थोक में नहीं खरीद रहे, जिससे बिक्री भी घटी है।’

हालांकि अब बारिश का दौर थमने लगा है और किसानों ने खेतों में सब्जियों की रोपाई शुरू कर दी है। उम्मीद जताई जा रही है कि अगले कुछ हफ्तों में टमाटर, भिंडी, लौकी और तोरी जैसी स्थानीय सब्जियां बाजार में आने लगेंगी। इससे कीमतों में थोड़ी राहत मिल सकती है। मगर व्यापारियों का मानना है कि दीपावली तक किसी बड़ी गिरावट की संभावना कम है।
इस महंगाई ने एक बार फिर रसोई को संकट का केंद्र बना दिया है। महिलाओं को हर दिन बजट बनाकर खरीदारी करनी पड़ रही है। सब्जियों की जगह सस्ती दालें, सूखे खाद्य पदार्थ और वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भरता बढ़ गई है। शहर के पुरानी आबादी क्षेत्र में रहने वाली गृहिणी विमला देवी कहती हैं, ‘अब हर सब्जी तो खरीद नहीं सकते। पहले 600 रुपये में चार दिन का काम चल जाता था, अब दो दिन भी मुश्किल है। हफ्ते में दो बार सब्जी खरीदते थे, अब एक बार ही ले रहे हैं।’



