






गोपाल झा.
सच बोलोगे? तो सजा पाओगे! जी हां! यह बात अब नारे जैसी नहीं, एक स्थायी नीति जैसी लगती है। खासकर तब जब माउंट आबू की शांत वादियों में कोई पत्रकार पिटता है और बिहार में एक वरिष्ठ पत्रकार पर एफआईआर दर्ज होती है। क्या यह वही भारत है, जो कभी दुनिया को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाता था? क्या यह वही लोकतंत्र है, जिसकी आत्मा संसद नहीं, पत्रकारिता थी?
राजस्थान का माउंट आबू, इन दिनों शांति के लिए नहीं, शोर के लिए सुर्खियों में है। यहां एक पत्रकार ने नगरपालिका के भ्रष्टाचार की परतें उधेड़ीं, तो सत्ता का तंत्र भड़क गया। कुछ कर्मचारियों को निलंबित करना पड़ा, लेकिन जवाब में क्या मिला? उसी पत्रकार को नगरपालिका के दफ्तर में पीटा गया, एक सच बोलने वाला कलमकार लहूलुहान पड़ा रहा। आरोपित बेखौफ हैं, सत्ता का सहारा पाकर।
उधर बिहार में वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने जब वोटर लिस्ट में चुनाव आयोग की गड़बड़ियों को उजागर किया, तो उन्हें मिली एक ‘एफआईआर’ की सौगात। ऐसे हालात में प्रश्न उठता है, क्या अब सच लिखना, सच बोलना, सच दिखाना एक अपराध है?
पत्रकारों की सुरक्षा अब उनके अपने साहस पर टिकी है। न कोई कानून उन्हें ढाल बनाता है, न कोई व्यवस्था उनकी पीड़ा सुनती है। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि पत्रकारिता का अर्थ बदलता जा रहा है। कभी जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया, वह अब सरकारों की नजर में ‘खतरनाक दीवार’ बन चुका है। सरकार ने ‘अपना मीडिया’ रच लिया है, वह मीडिया जो सिर्फ ‘गुणगान’ करता है, सवाल नहीं। सरकारों को अब जवाब नहीं चाहिए, सिर झुकाए हुए चेहरे चाहिए।
प्रिंट मीडिया भी इस शिकंजे से अछूता नहीं रहा। या तो वह पूरी तरह समर्पित हो चुका है या अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रहा है। और पत्रकार? वह अब पत्रकार नहीं, एक चलती-फिरती लक्ष्मण रेखा बन गया है। वह रेखा पार करते ही ‘अपराधी’ बन जाता है।
तंत्र को आईना दिखाना गुनाह क्यों है? वो कहते हैं, ‘मत बोलो वरना मुकदमा हो जाएगा, मत लिखो वरना संस्थान से निलंबन हो जाएगा, मत देखो वरना तुम्हारी आंखें फोड़ दी जाएंगी।’
क्या लोकतंत्र का यही संस्करण है? क्या यही वह ‘आज़ादी’ है जिसके लिए फाँसी के फंदे चूमे गए थे? पत्रकार जब समाज का आईना बनता है, तो वह केवल जनता की नहीं, सत्ता की भी तस्वीर दिखाता है। पर आज सत्ता को अपना अक्स देखना मंजूर नहीं। आज का शासक उस राजा की तरह हो गया है, जिसे केवल प्रशंसा के शेर पसंद हैं, आलोचना की मिसालें नहीं। ऐसे में जब अजीत अंजुम जैसे पत्रकार मैदान में उतरते हैं, नंगे पांव लोकतंत्र की सच्चाई को टटोलते हैं, तो व्यवस्था तिलमिला उठती है।
कहने को देश में सैकड़ों पत्रकार संगठन होंगे, नाम के। या फिर सरकार के साथ नजदीकियां बनाकर ‘काम’ निकालने वाले। राजस्थान में भी संगठनों की बहार है। दो पत्रकार मिलकर नेशनल लेवल का संगठन खड़ा करने की कुव्वत रखते हैं। लेकिन इससे क्या ? ऐसे दौर में, निजी तौर पर मैं आईएफडब्ल्यूजे के प्रदेशाध्यक्ष उपेंद्र सिंह राठौड़ की तारीफ करता हूं जो कम से कम विरोध तो करते हैं, पत्रकारों के साथ दिखने का साहस तो दिखाते हैं, परिणाम भले कुछ भी हो। अपनी तरफ से प्रयास तो करते हैं। लेकिन बाकी संगठन ?
आज सबसे बड़ा सवाल है, क्या पत्रकार अकेले ही यह लड़ाई लड़ते रहें? क्या समाज की कोई जिम्मेदारी नहीं? क्या नागरिक होने का अर्थ सिर्फ बिजली बिल और वोट देना रह गया है? नहीं। समाज को चाहिए कि जब पत्रकार पर हमला हो, तो उसकी आवाज़ बुलंद करे। जब अभिव्यक्ति कुचली जाए, तो उसकी पीड़ा को साझा करे। सत्तापक्ष और विपक्ष के वे लोग, जिनमें थोड़ी भी संवेदना बाकी है, उन्हें आगे आना होगा। लोकतंत्र किताबों में नहीं, किरदारों में जिंदा रहता है। अगर किरदार डर जाएंगे, तो किताबें भी खामोश हो जाएंगी।
आज की सत्ता ने इमरजेंसी घोषित नहीं की, पर आपातकाल जैसे हालात बना दिए हैं। न पत्रकार सुरक्षित हैं, न कलाकार, न लेखक, न कवि। हर कोई डर के साए में जी रहा है। और आप? आप भी जब तक खुद इसकी चपेट में नहीं आओगे, तब तक खामोश रहोगे?
राहत इंदौरी साहब का ये शेर याद रखें
जब आग लगेगी तो सब आएंगे जद में,
कोई मेरा मकान ही थोड़े है!
आज किसी और के मकान में आग लगी है, कल आपकी बारी होगी। इसलिए अब वक्त है, उठने का, बोलने का, लिखने का, सच के साथ खड़े होने का। आज जब अजीत अंजुम जैसे पत्रकार ग्राउंड रिपोर्टिंग का मर्म सिखा रहे हैं, तब यह समझना ज़रूरी है कि असली पत्रकारिता वही है, जो सत्ता की आँख में आँख डालकर सवाल पूछे। न कि वह जो प्रवक्ता बन जाए सत्ताधीशों का। आज अगर अंजुम के साथ हम नहीं खड़े हुए, तो कल हमारे पास कोई अंजुम भी नहीं बचेगा। पत्रकारिता अब एक युद्ध है, सच के लिए, समाज के लिए, आने वाली नस्लों के लिए। और हम सब, जो कलम को पूजते हैं, जिन्हें संवाद का महत्व मालूम है, जो सवालों से डरते नहीं, उन्हें तय करना है कि हम सिर्फ दर्शक रहेंगे या सिपाही बनेंगे।
अंत में…
लोकतंत्र की जान उसकी ‘आवाज़’ में होती है। और पत्रकार उसकी आवाज़ हैं। अगर आवाज़ को चुप करा दिया जाए, तो समझिए लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है। और यह केवल पत्रकारों की लड़ाई नहीं, यह आपके और हमारे अस्तित्व की लड़ाई है। इसलिए…., लड़िए, जुड़िए, लिखिए, और सच के साथ खड़े होइए।
क्योंकि ‘सच को कोई खत्म नहीं कर सकता, बस कुछ देर के लिए दबाया जा सकता है। और पत्रकार वही होता है जो दबे हुए सच को ढूंढ़कर फिर से समाज के सामने रख दे।
अगर वो अपराध है, तो हां, हम ‘अपराधी’ हैं, और फख्र से हैं।





