




भटनेर पोस्ट साहित्य डेस्क.
रविवार का दिन हनुमानगढ़ के साहित्य जगत के लिए भावनाओं और स्मृतियों का संगम लेकर आया। जंक्शन स्थित बेबी हैप्पी मॉडर्न पीजी कॉलेज का प्रांगण उस समय साहित्यिक संवेदनाओं से गूंज उठा, जब कागद फाउंडेशन, हनुमानगढ़ के तत्वावधान में दिवंगत साहित्यकार ओम पुरोहित ‘कागद’ की स्मृति में गरिमामयी सम्मान समारोह का आयोजन हुआ। इस अवसर पर हिंदी, राजस्थानी और युवा साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले तीन साहित्यकारों को ‘कागद स्मृति साहित्य सम्मान’ प्रदान किया गया।
मुख्य अतिथि के रूप में प्रख्यात शिक्षाविद् एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. बी.एल. सहू उपस्थित थे, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में उद्योगपति शिवशंकर खड़गावत, एसकेडी यूनिवर्सिटी के मैनेजिंग डायरेक्टर दिनेश जुनेजा और भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष देवेंद्र पारीक मंचासीन रहे। स्वागताध्यक्ष के रूप में कॉलेज के डायरेक्टर तरुण विजय ने समारोह में गरिमामय उपस्थिति दर्ज कराई।

तीन विभूतियों को मिला ‘कागद स्मृति साहित्य सम्मान’
कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार गोविंद शर्मा को हिंदी साहित्य, रामस्वरूप किसान को राजस्थानी साहित्य और युवा साहित्यकार पवन अनाम को उनकी रचनात्मक साधना के लिए सम्मानित किया गया। कागद फाउंडेशन के उपाध्यक्ष राजेश चड्ढा ने सधे हुए अंदाज में संचालन करते हुए समारोह को रोचक और भावपूर्ण बनाए रखा।
इस अवसर पर फाउंडेशन के सह सचिव विरेंद्र छापोला, कोषाध्यक्ष डॉ. संतोष राजपुरोहित, राज तिवाड़ी, एडवोकेट दिनेश दाधीच, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. भरत ओला, डॉ. कृष्ण कुमार आशु, डॉ. संदेश त्यागी, डॉ. अरुण शाइरिया, डॉ. प्रेम भटनेरी, भारती पुरोहित, अंकिता पुरोहित, सुरेंद्र सत्यम, डॉ. राजवीर सिंह, मोहनलाल वर्मा सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार, पत्रकार और साहित्य-प्रेमी मौजूद थे।

साहित्य के सामने संकट का दौर: सहू
मुख्य अतिथि डॉ. बी.एल. सहू ने कहा कि आज साहित्य के सामने संकट का दौर है। टीवी और मोबाइल के युग में पाठक कम होते जा रहे हैं, सच को छिपाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ऐसे समय में साहित्यकारों का दायित्व है कि वे समाज के सामने सच को निर्भीकता से रखें। उन्होंने विश्वास जताया कि अंधेरा अवश्य छंटेगा और साहित्य का उजाला फिर लौटेगा, बशर्ते हम साहित्यिक माहौल बनाने की दिशा में सामूहिक प्रयास करें। उन्होंने ओम पुरोहित ‘कागद’ के साथ अपने संबंधों को याद करते हुए कहा, ‘कागद औपचारिक रूप से मेरे विद्यार्थी नहीं रहे, लेकिन उन्होंने हमेशा मुझे गुरु का स्थान दिया। यह संबंध केवल साहित्य तक सीमित नहीं था, बल्कि एक भावनात्मक बंधन भी था। उनका असामयिक जाना न केवल उनके परिवार के लिए बल्कि पूरे साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।’

चुम्बकीय व्यक्तित्व था कागद का: किसान
राजस्थानी साहित्यकार रामस्वरूप किसान ने सम्मान को प्रेम की तरह बताया, ‘जब जिसे मिलता है, उसके मन में यह भरोसा पैदा होता है कि उसकी लेखनी पर समाज की नजर है।’ उन्होंने कहा कि कागदजी की स्मृति में सम्मान पाना सुखद होते हुए भी उनके लिए भावुक करने वाला क्षण है, क्योंकि वे उम्र में छोटे थे। किसान ने कागदजी के व्यक्तित्व को चुंबकीय बताते हुए कहा कि वे जहां भी जाते, लोगों को अपनी ओर खींच लेते। वे केवल रचनाकार नहीं, बल्कि साहित्यिक आयोजनों के माध्यम से समाज में साहित्य के प्रति सकारात्मक वातावरण तैयार करने वाले भी थे।

विरल प्रतिभा के धनी थे कागद: गोविंद शर्मा
वरिष्ठ साहित्यकार गोविंद शर्मा ने कहा कि ओम पुरोहित ‘कागद’ साहित्य की हर विधा में सिद्धहस्त थे। गद्य हो या पद्य, वे दोनों में समान अधिकार रखते थे। उनकी स्मृति में सम्मान पाना उनके लिए हर्ष और विस्मय का क्षण है। उन्होंने कागद फाउंडेशन की सराहना करते हुए कहा कि इस स्तर पर हर साल आयोजन करना बड़ी बात है, और यह कार्य प्रेरणास्रोत है।

अतिथियों ने रखी अपनी बात
स्वागताध्यक्ष तरुण विजय ने बेबी हैप्पी मॉडर्न पीजी कॉलेज में यह तीसरा आयोजन होने की बात बताते हुए कहा कि फाउंडेशन के हर आह्वान पर वे तत्पर रहेंगे। उन्होंने कागदजी से जुड़े कई रोचक संस्मरण साझा किए। विशिष्ट अतिथि शिवशंकर खड़गावत, दिनेश जुनेजा और देवेंद्र पारीक ने कागदजी को बहुआयामी व्यक्तित्व का धनी बताते हुए कहा कि उनके जीवन से सीखने के लिए बहुत कुछ है। कवि विनोद स्वामी ने कागद को राजस्थानी का सच्चा बेटा बताया, जो अपनी माटी से अटूट प्रेम करता था। उन्होंने राजस्थानी भाषा आंदोलन में कागद की भूमिका को रेखांकित करते हुए कई संस्मरण सुनाए, जिससे सभा में एक भावपूर्ण वातावरण बन गया। कागद फाउंडेशन के महासचिव नरेश मेहन ने अतिथियों का स्वागत किया और फाउंडेशन की गतिविधियों की जानकारी दी। उन्होंने ओम पुरोहित ‘कागद’ के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।
अध्यक्ष भगवती पुरोहित ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों और सहयोगियों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम के अंत में संचालक राजेश चड्ढा ने भी कागदजी से जुड़े अनेक संस्मरणों के माध्यम से उनकी साहित्यिक यात्रा को जीवंत कर दिया।
इस गरिमामयी आयोजन ने न केवल एक साहित्यकार की स्मृति को संजोया, बल्कि यह भी संदेश दिया कि सच्चा साहित्य समय, समाज और पीढ़ियों के पार जाकर अपने पाठकों को खोज लेता है, भले ही उसे रास्ते में कितने ही अंधेरे क्यों न मिलें।

