




डॉ. एमपी शर्मा.
भारत में तेजी से फैल रही एक ऐसी खामोश महामारी है, जो न तो छाती में दर्द देती है, न ही सांसें रोकती है, लेकिन धीरे-धीरे ज़ुबान को जकड़ लेती है, गालों को सड़ा देती है और जीवन को निगल जाती है। यह है मुख या ओरल कैंसर। मुंह, गाल, होंठ, जबान, मसूड़े और गले तक को अपनी चपेट में लेने वाला यह कैंसर भारत में सबसे आम और सबसे घातक कैंसरों में से एक बन चुका है, खासकर ग्रामीण और निम्न आय वर्ग में।
इस जानलेवा बीमारी की सबसे बड़ी वजह है हमारी लतें, खासकर तंबाकू और गुटखे की। गली-गली में बिकती चटपटी पुड़िया जब दांतों के नीचे दबती है, तो वह सिर्फ़ स्वाद नहीं छोड़ती, बल्कि ज़हर भी छोड़ जाती है। गुटखा, खैनी, जर्दा और अन्य चबाने वाले तंबाकू उत्पाद इसका प्रमुख कारण हैं। साथ ही बीड़ी, सिगरेट और हुक्का जैसी धूम्रपान आदतें भी इस आग में घी का काम करती हैं। सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब तंबाकू और शराब का सेवन एक साथ किया जाता है, जिससे मुख कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
मुंह की सफाई में लापरवाही, बार-बार घाव या छाले को नजरअंदाज करना, खराब दांतों की चिकित्सा में देर करना भी इस कैंसर को जन्म दे सकते हैं। हाल के वर्षों में ओरल सेक्स से फैलने वाले ह्यूमन पेपिलोमा वायरस को भी मुख कैंसर का एक प्रमुख कारण माना गया है। वहीं लगातार मसालेदार, गर्म और खुरदुरे भोजन का सेवन, पोषण की कमी और विटामिन ए और सी की न्यूनता भी शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देती है, जिससे यह बीमारी आसानी से जड़ें जमा लेती है।
भारत और इसके पड़ोसी देश, बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान और नेपाल मुख कैंसर से सबसे अधिक प्रभावित हैं। भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में यह अधिक देखने को मिलता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रचलन अधिक है, जहां गुटखा और खैनी का खुलेआम सेवन होता है, और जहां जागरूकता की भारी कमी है।
कभी यह कैंसर बुजुर्गों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब 20 से 30 वर्ष के युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। खासकर युवा वर्ग में गुटखे की लत, स्कूल-कॉलेज से लेकर खेत-खलिहानों तक फैल गई है। आंकड़ों के मुताबिक, यह बीमारी पुरुषों में महिलाओं की तुलना में चार गुना अधिक देखी जाती है, लेकिन हाल के वर्षों में महिलाओं में भी गुटखा और बीड़ी की लत के चलते आंकड़े चिंताजनक हो चले हैं।

कैंसर की पहचान अगर प्रारंभिक स्तर पर हो जाए, तो इसका इलाज संभव है। लेकिन समस्या तब होती है जब मरीज़ लक्षणों को लंबे समय तक नजरअंदाज करता है। जैसे, मुंह या गाल में कोई घाव जो भर नहीं रहा, जीभ या गाल में कोई गांठ या मोटापन, निगलने में कठिनाई, मुंह खोलने में दिक्कत, आवाज़ में बदलाव या लगातार जलन और दर्द। ऐसे संकेतों को मामूली न समझें। मुँह की शारीरिक जांच, बायोप्सी और गांठों का परीक्षण कैंसर की पुष्टि करते हैं। इलाज के तौर पर कैंसर ग्रस्त ऊतक को हटाने के साथ-साथ रेडिएशन थेरेपी और कीमोथेरेपी की जाती है। गंभीर मामलों में भोजन, बोली और चेहरे की कार्यक्षमता बहाल करने के लिए फिजियोथेरेपी और रिहैबिलिटेशन की आवश्यकता भी होती है।
लेकिन इलाज से ज्यादा जरूरी है बचाव। सबसे पहले और सबसे जरूरी है, गुटखा, खैनी, बीड़ी और तंबाकू से तुरंत दूरी बनाना। यह फैसला जितना जल्दी लिया जाए, जीवन उतना ही सुरक्षित रहेगा। मुंह की नियमित सफाई, साल में एक बार दांतों की जांच, शराब का सीमित या त्याग करना, और हरी पत्तेदार सब्जियों, फल, टमाटर व नींबू जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर संतुलित आहार से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई जा सकती है।

मुख कैंसर पूरी तरह से रोका जा सकने वाला कैंसर है। इसके लिए न तो बड़ी तकनीक की जरूरत है, न भारी भरकम धन की, सिर्फ थोड़ी सी जागरूकता, सही जानकारी और आत्मसंयम की जरूरत है। यह आवश्यक है कि सरकार, चिकित्सा संस्थाएं, सामाजिक संगठन और स्कूल-कॉलेज मिलकर मुख कैंसर के खिलाफ अभियान चलाएं। गांव-गांव जाकर लोगों को बताया जाए कि एक छोटी-सी लत किस तरह जीवन को छोटा कर देती ळें मुख का कैंसर धीरे-धीरे पनपता है, पर जीवन को तेजी से खत्म करता है।”
जब हम यह समझ लेंगे कि हमारी आदतें ही हमारी सबसे बड़ी बीमारी की वजह बन रही हैं, तभी हम इस खतरनाक लेकिन पराजेय दुश्मन से लड़ने के लिए तैयार होंगे। आइए, नशा छोड़ें, जीवन अपनाएं, ताकि मुस्कान सिर्फ चेहरे की नहीं, जीवन की पहचान बन सके।
-लेखक जाने-माने सीनियर सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं


