

भटनेर पोस्ट पॉलिटिकल डेस्क.
हनुमानगढ़ नगरपरिषद क्षेत्र में चुनाव का शोर अब रणनीति की सरसराहट में बदल रहा है। संकेत साफ़ हैं, राजस्थान में शहरी निकायों के चुनाव इसी वर्ष होने हैं; पर असली ठिकाना इस बात पर टिक गया है कि सभापति (चेयरमैन) का चुनाव सीधे मतदाताओं से होगा या निर्वाचित पार्षदों से। चुनाव-पद्धति की यही अनिश्चितता पूरे खेल का चरित्र, खिलाड़ी और उनकी चालें तय करेगी।
ज़िले की राजनीति का ताना-बाना इस समय निर्दलीय विधायक गणेशराज बंसल की धुरी पर घूमता दिखता है, जिन्होंने राज्य स्तर पर बीजेपी को समर्थन दे रखा है। स्थानीय पटल पर उनकी और पूर्व बीजेपी प्रत्याशी अमित चौधरी की सार्वजनिक खटास पार्टी की ‘भीतरघात-घुसपैठ’ वाली कहानियों को हवा देती रही है। नगरपरिषद की अंदरुनी राजनीति पर गौर करें तो तत्कालीन उपसभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव में दिखे रुझान के आधार पर लगभग 53 पार्षदों का झुकाव बंसल खेमे की ओर माना जा रहा है। यह आंकड़ा यदि अगली बिसात तक कायम रहा, तो अप्रत्यक्ष चुनाव की स्थिति में बंसल-धुरी निर्णायक शक्ति केंद्र बने रहेंगे।

इतिहास के पन्ने पलटें तो हनुमानगढ़ में सीधे जन-मत से चेयरमैन का चुनाव केवल एक बार हुआ। तब बीजेपी की सुरेंद्र कौर ने कांग्रेस की भानु भादू को हराकर ताज पहना था। यही मिसाल शहर में ‘चेयरमैन = मिनी विधायक’ वाली धारणा को पुष्ट करती है, जब जनादेश सीधे व्यक्ति को मिले, तो पद का सामाजिक-पॉलिटिकल ग्रेविटी सेंटर बदल जाता है।

सीधे चुनाव होते ही समीकरण तीन मुद्दों पर खड़े हो जाते हैं, चेहरा, ऐसा प्रत्याशी, जिसकी निजी छवि साफ़-सुथरी हो, शहरव्यापी पहचान हो, और जो किसी एक मोहल्ले की बजाय पूरे नगर का नैरेटिव पकड़ सके। धन, नगर-स्तरीय, मीडिया-हैवी, ग्राउंड-इंटेंस कैंपेनिंग महंगी होती है; संसाधन जुटाने की क्षमता केंद्रीय कसौटी बनती है। तीसरा है प्रभाव। अमूमन देखा जाता है कि बहुध्रुवीय मुकाबले में बूथ-टु-बूथ मैनेजमेंट, समुदाय व संस्थाओं के साथ तालमेल और स्वंयसेवी समूहों की लामबंदी जीत-हार का मार्जिन तय करती है।

इस परिदृश्य में पार्षदों की भूमिका सिमटती है, वे ‘किंगमेकर’ कम, ‘कैंपेनेर’ अधिक हो जाते हैं। पार्टी टिकट का मूल्य भी बदलता है। दल जनप्रिय, धनी, और डिलीवरी-कैपेबल चेहरों की ओर झुकते हैं। बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए चुनौती एक-सी है। ऐसा नाम जो लोकप्रियता $ पर्सनल वोट बैंक $ फंडरेज़िंग $ संगठनात्मक तालमेल, चारों मोर्चों पर खरा उतरे। यही वह मोड़ है जहाँ समाज-आधारित प्रभावशाली व्यक्तित्व, उद्योग व व्यापार से जुड़े प्रतिष्ठित चेहरों, और सामाजिक संगठनों के अग्रणी कार्यकर्ताओं को टिकट की दौड़ में वास्तविक बढ़त मिलती है।

अप्रत्यक्ष चुनाव में पूरी बिसात संख्या और अनुशासन पर टिकती है। यहाँ व्हिप, क्रॉस-वोटिंग का रिस्क, और ठोस फ्रैक्शन-मैनेजमेंट निर्णायक बनते हैं। मौजूदा संकेतों के अनुसार बंसल-परिसीमा में आए पार्षदों की बहुलता यदि जस-की-तस रहती है तो चेयरमैन चयन की चाबी उसी धुरी के पास रहेगी। ऐसे में दोनों राष्ट्रीय दलों की रणनीति ‘टिकट’ से अधिक ‘टैली’ पर फोकस करेगी, किस वार्ड में किसे उतारकर बोर्ड का अंकगणित सुरक्षित करना है; किस फ्रैक्शन में असंतोष-प्रबंधन कैसे करना है; और कब किसको ‘मर्यादित महत्व’ देकर लाइन में रखना है।

यहाँ चेयरमैन का चुनाव बंद दरवाज़ों के भीतर की सहमति, सौदेबाज़ी और सियासी अनुशासन से तय होता है। दलों की आंतरिक एकता, स्थानीय क्षत्रपों की समन्वय क्षमता और ‘अंतिम क्षण में पाला बदलने’ से बचाव का कौशल, सबसे बड़ी पूंजी बनते हैं।
नगर निकायों में आरक्षण की श्रेणी (सामान्य/महिला/पिछड़ा/अन्य) उम्मीदवारों की सूची ही नहीं, कैंपेन के सरोकार भी बदल देती है। यदि इस बार पद सामान्य (पुरुष/महिला) के लिए आरक्षित रहा और चुनाव सीधे हुए, तो बहुकोणीय मुकाबला लगभग तय है। ऐसे में समुदाय-आधारित माइक्रो-मैनेजमेंट, बूथ क्लस्टरों की पहचान, मोहल्ला-वार मुद्दों का कस्टमाइज्ड पैकेज, और अग्रिम गठबंधनों की सूक्ष्म बुनाई, जीत का सूत्र बनेंगे। दूसरी ओर, अप्रत्यक्ष चुनाव में आरक्षण का असर उम्मीदवार-चयन तक सीमित नहीं, बल्कि पार्षदों के भीतर बनने वाले सपोर्ट ब्लॉक्स पर भी पड़ता है।

बीजेपी के सामने दोहरी कसौटी है, एक ओर राज्य-स्तरीय साख और सरकार की डिलीवरी नैरेटिव, दूसरी ओर हनुमानगढ़ में बंसल-चौधरी खेमों के बीच इंट्रा-पार्टी हार्मनी। सीधे चुनाव की दशा में पार्टी को ‘सिटी-फेस’ चाहिए, ऐसा नाम जो ध्रुवीकरण न करे, पर कोर वोट-बेस को भी उदास न छोड़े। अप्रत्यक्ष में प्राथमिकता संख्या-सुरक्षा और ‘बिना शोर की जीत’ होगी।

कांग्रेस के लिए मुख्य चुनौती काडर की ऊर्जा पुनर्संचयन और ‘अच्छी छवि $ संसाधन’ वाले चेहरे की समय रहते एनाउंसमेंट है। सीधे चुनाव हुए तो पार्टी को क्रॉस-कम्युनिटी अपील वाला प्रत्याशी उतारना होगा; अप्रत्यक्ष में उसे वार्ड-वार ज़मीनी संगठन और डील-मेकिंग की दक्षता दिखानी पड़ेगी। हाल की स्थानीय जंगों में व्यापारी संगठनों और पेशेवर निकायों का रुख, गोपनीय ठप्पे की तरह मतदान दिवस पर असर डालता है; कांग्रेस को इसी स्पेस में स्प्रिंट की ज़रूरत है।

सीधे चुनाव की दशा में स्वतंत्र/लोकल-आइकन उम्मीदवारों की एंट्री आसान होती है। सफाई, ट्रैफिक, जल-निकासी, टैक्स रियायत, स्ट्रीट वेंडिंग ज़ोन, अनाधिकृत कॉलोनियों का नियमन जैसे माइक्रो लेकिन ठोस शहरी मुद्दे किसी ‘नॉन-पार्टी’ चेहरे को विशाल सामुदायिक समर्थन दिला सकते हैं। यह वही स्पेस है जहाँ परंपरागत दलों की टिकट-राजनीति अक्सर पीछे छूट जाती है।
चर्चा है कि जन्माष्टमी के बाद राजनीतिक गरमाहट बढ़ना स्वाभाविक है। त्यौहारों की भीड़, सामाजिक कार्यक्रमों की बहुलता और बाजार की रौनक, ‘माइक्रो-आउटरीच’ के लिए बेहतरीन पृष्ठभूमि बनाते हैं। जैसे-जैसे सर्दियाँ आएंगी, सियासी गर्मी चढ़ेगी, नरमी सिर्फ़ भाषणों में रहे, मैदान में नहीं।

हनुमानगढ़ की जंग इस बार प्रक्रिया पर निर्भर है। सीधे चुनाव होने पर ‘चेहरा और चनाुव-प्रबंधन’ की परीक्षा होगी; पार्षद-निर्वाचित पद्धति में ‘अंकगणित और अनुशासन’ की। बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए असली चुनौती स्थानीय क्षत्रपों की तालमेल और विश्वसनीय शहरी एजेंडा है। जो पक्ष समय रहते स्पष्ट संदेश, स्पष्ट चेहरा, और स्पष्ट रोडमैप लेकर मैदान में उतरेगा, वही मतदाता की चुप्पी के भीतर छुपी सहमति को अपनी ओर मोड़ पाएगा।
फिलहाल, सरकार के ‘पत्ते’ बंद हैं; पर शहर की बिसात बिछ चुकी है। अब हर चाल, उम्मीदवार चयन से लेकर मोहल्ला-वार मुद्दों तक निर्णायक होगी। हनुमानगढ़ तय करेगा कि उसे ‘मिनी विधायक’ चाहिए या ‘काउंसिल-मैनेजर’। मतदान-पद्धति जिस ओर झुकेगी, शहर की राजनीति उसी अनुरूप अपनी नयी पटकथा लिख देगी।

