





डॉ. एमपी शर्मा.
सदियों से बदलते युग, बदलते क़ानून और बदलते समाज के बावजूद, स्त्री के सम्मान की लड़ाई आज भी अधूरी है। त्रेता की अग्निपरीक्षा से लेकर द्वापर की सभा में चीरहरण तक, मध्यकाल के जौहर से लेकर आधुनिक युग के साइबर उत्पीड़न तक। इतिहास गवाह है कि स्त्री को बार-बार अपमान, हिंसा और संदेह का सामना करना पड़ा है। सवाल वही है, क्या केवल समय बदला है, या मानसिकता भी बदली है? और यदि नहीं, तो आखिर कब बदलेगी यह सोच, कब थमेगा यह अन्याय?
त्रेता में सीता अग्नि में उतरीं, द्वापर में द्रौपदी सभा में अपमानित हुईं, मध्यकाल में रानियों ने अस्मिता बचाने को जौहर किया, और आज भी बेटियां सड़कों, दफ्तरों और इंटरनेट पर अपमान और हिंसा से जूझ रही हैं। सवाल वही है, कब बदलेगी यह सोच, कब रुकेगा यह अन्याय?

त्रेता युग, जिसे मर्यादा और धर्म का युग कहा जाता है, वहां भी स्त्री को अपमान और कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ा। शूर्पणखा की नाक कटना, यह केवल एक महिला का अपमान नहीं था, बल्कि युद्ध और विनाश का बीज था। सीता हरण और अग्नि परीक्षा। रावण का वध होने के बाद भी सीता को समाज के संदेह के कारण अग्नि परीक्षा देनी पड़ी। गर्भवती होते हुए भी वनवास, यह उस समय की कठोर मानसिकता का प्रमाण है। सुग्रीव-बाली प्रसंग हमें सत्ता संघर्ष में स्त्री को अधिकार की वस्तु समझ लेने की याद दिलाता है।

द्वापर युग की महाभारत केवल युद्ध की नहीं, बल्कि स्त्री के अपमान की भी कहानी है। द्रौपदी का जुए में दांव लगना, पति द्वारा पत्नी को हार जाना और सभा में चीरहरण का प्रयास, स्त्री को पुरुष की संपत्ति मानने का सबसे बड़ा उदाहरण है। गांधारी का अपनी इच्छा के विरुद्ध अंधे राजा से विवाह करना, राजनीति के लिए स्त्री के जीवन का सौदा करना।

कुंती और माद्री, राजनीति और कूटनीति में भूमिका होने के बावजूद, उन्हें ‘पत्नी’ और ‘माँ’ की सीमाओं में ही बांध दिया गया।
मध्यकाल का इतिहास स्त्रियों की अस्मिता की रक्षा के लिए किए गए बलिदानों से भरा है। रानी पद्मिनी का जौहर। अस्मिता बचाने के लिए स्वयं को अग्नि में समर्पित करना, वीरता के साथ-साथ विवशता का प्रतीक था। चित्तौड़ और रणथंभौर के जौहर, हजारों स्त्रियों का बलिदान, जो आज भी इतिहास में दर्ज है। अब्दाली और अन्य आक्रमण, युद्ध में हार के बाद स्त्रियों को कैद कर गुलाम बनाना, यह उस दौर की क्रूर सच्चाई थी।

समय बदला, कानून बने, पर स्त्री पर अत्याचार के रूप भी बदलकर जारी हैं। निर्भया कांड (2012), जिसने देश को हिला दिया और महिला सुरक्षा की बहस को तेज किया। मणिपुर (2023), संघर्ष के दौरान महिलाओं का सार्वजनिक अपमान, जिसे पूरी दुनिया ने देखा। हाथरस और उन्नाव, राजनीतिक दबाव, भय और न्याय की कठिन राह। साइबर उत्पीड़न, तकनीक के युग की नई चुनौती, जहां ऑनलाइन ट्रोलिंग, ब्लैकमेल और डीपफेक जैसी घटनाएं आम हैं। फातिमा शेख, सावित्रीबाई फुले के साथ महिला शिक्षा की शुरुआत, पर समाज से तिरस्कार झेलना। बीना दास (1932), गवर्नर पर गोली चलाने वाली क्रांतिकारी, जिनका नाम बहुत कम लोग जानते हैं। महिला पुलिसकर्मी के उत्पीड़न मामले, सत्ता तंत्र के भीतर भी स्त्रियों को सुरक्षा का अभाव।

सदियों से स्त्री को एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में देखने के बजाय ‘किसी की बेटी, पत्नी या माँ’ के रूप में देखा गया। उसे ‘परिवार की इज्जत’ या ‘संपत्ति’ मानने की मानसिकता ही हिंसा और भेदभाव की सबसे बड़ी जड़ है।
महिलाओं व बेटियों के प्रति नजरिया बदलने के लिए समाज के दायित्व हैं। बेटियों को समान शिक्षा और आत्मरक्षा प्रशिक्षण देकर बचपन से बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास करना चाहिए। महिला सुरक्षा कानूनों का बिना देरी के पालन हो। पुरुषों में सम्मान की शिक्षा, घर और स्कूल से ही यह संस्कार देना। मीडिया की जिम्मेदारी, स्त्री को केवल वस्तु के रूप में न दिखाना। समान अवसर, पंचायत से संसद तक महिलाओं की बराबर भागीदारी।

हमारे सामने वीरता की कई मिसालें हैं। रानी लक्ष्मीबाई, अहिल्या बाई होलकर, कैप्टन लक्ष्मी सहगल, फातिमा शेख और सावित्रीबाई फुले आदि। त्रेता से आज तक स्त्री की परीक्षा खत्म नहीं हुई, बस सवाल बदल गए हैं। कभी अग्नि परीक्षा, कभी जौहर, कभी अदालत की तारीखें, तो कभी सोशल मीडिया ट्रोलिंग। सच्चा बदलाव तब आएगा, जब समाज स्त्री को समान अधिकारों वाली, स्वतंत्र और सक्षम नागरिक के रूप में स्वीकार करेगा, न कि किसी की ‘इज्जत’ या ‘संपत्ति’ के रूप में।
-लेखक सीनियर सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं
