




भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
राजस्थान में प्रारंभिक शिक्षा निदेशालय ने एक ऐसा आदेश जारी किया है, जिसने पूरे शिक्षा जगत में खलबली मचा दी है। आदेश के मुताबिक, अब कोई भी शिक्षक या विभागीय कर्मचारी सोशल मीडिया पर ‘अवांछित, राष्ट्रविरोधी या असंवैधानिक’ पोस्ट या चैट नहीं करेगा। नियम तोड़ने वालों पर सेवा नियमों के तहत सख्त कार्रवाई की जाएगी, जिसमें निलंबन तक शामिल हो सकता है।

प्रारंभिक शिक्षा निदेशक की ओर से जारी आदेश इशारा करता है कि सरकार शिक्षकों की ऑनलाइन गतिविधियों पर अब पूरी तरह नियंत्रण चाहती है। आदेश में कहा गया है कि सभी शिक्षक और कर्मचारी सोशल मीडिया पर ऐसी कोई भी सामग्री साझा न करें, जिससे सरकार, समाज या संविधान की गरिमा को ठेस पहुंचे।

यह आदेश राज्य सरकार के स्तर पर लिया गया फैसला है। इसके पीछे तर्क यह है कि सरकारी शिक्षक केवल बच्चों के शिक्षक नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए रोल मॉडल होते हैं। ऐसे में उनकी वाणी और लेखनी, चाहे कक्षा में हो या फेसबुक-व्हाट्सऐप पर समाज को प्रभावित करती है।

सरकार का मानना है कि पिछले कुछ समय से कई उदाहरण सामने आए हैं, जब सरकारी शिक्षकों या कर्मचारियों ने सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्ट डालीं, जिनसे विवाद खड़ा हुआ। कहीं राजनीतिक दलों पर सीधा हमला बोला गया, तो कहीं सरकारी नीतियों को कठघरे में खड़ा किया गया। इन्हीं घटनाओं को आधार बनाकर सरकार ने यह कदम उठाया है। साफ संदेश है कि शिक्षक अगर समाज के आदर्श हैं, तो उनकी डिजिटल गतिविधियां भी अनुशासित और जिम्मेदार होनी चाहिए।

यह आदेश राज्य के सभी जिला शिक्षा अधिकारियों, शिक्षकों और शिक्षा विभाग के कार्मिकों पर लागू होगा। यानी स्कूल से लेकर कार्यालय तक, हर स्तर का कर्मचारी अब सोशल मीडिया पर अपनी राय व्यक्त करने से पहले सौ बार सोचेगा। खासकर वे शिक्षक, जो फेसबुक या ट्विटर पर सरकार की नीतियों की आलोचना करते आए हैं, अब दायरे में होंगे।

कानूनी भाषा में आदेश ‘अनुशासन और सेवा नियमों’ के दायरे में है, लेकिन शिक्षक इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश मान रहे हैं। राष्टपति अवार्डी रिटायर्ड शिक्षक डॉ. भरत ओला ‘भटनेर पोस्ट डॉट कॉम’ से कहते हैं, ‘इस तरह के आदेश की कोई जरूरत नहीं थी। देश और संविधान के खिलाफ कोई भी अपना पक्ष रखे, सरकार उस पर नियमानुसार कार्रवाई कर सकती है। कोई शिक्षक ऐसा क्यों करेगा ? लेकिन इसकी आड़ में शिक्षक वर्ग पर ‘चुप्पी साधने का दबाव’ बनाना अनुचित है। अगर शिक्षक नीतियों की खामियों पर सवाल भी नहीं उठा पाएंगे, तो शिक्षा व्यवस्था में सुधार कैसे होगा?’

डॉ. भरत ओला कहते हैं, ‘कुछ दिन पहले एक शिक्षक पर इसलिए मुकदमा दर्ज हुआ क्योंकि उसने पाखंड पर प्रहार किया था। कांवड़ यात्री बनने की जगह बच्चों को पढ़ने-लिखने और योग्य नागरिक बनने की शिक्षा दी थी। ऐसा पहली बार हुआ जब किसी शिक्षक को पाखंड के खिलाफ आवाज उठाने पर दंडित किया गया। ऐसे में साफ लगता है कि सरकार अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने का प्रयास कर रही है, जो सर्वथा अनुचित है।’




