



नम्रता गोल्याण.
समय के साथ समाज में केवल तकनीक और अर्थव्यवस्था ही नहीं बदलती, बल्कि सोच, जीवन-दर्शन और मूल्यों की परिभाषा भी निरंतर विकसित होती रहती है। हर पीढ़ी अपने अनुभवों, परिस्थितियों और चुनौतियों के आधार पर जीवन को देखने का अपना अलग दृष्टिकोण गढ़ती है। आज यह बदलाव विशेष रूप से दो पीढ़ियों के बीच स्पष्ट दिखाई देता है, एक ओर है जनरेशन एक्स (1965-1980), जिसने स्थिरता, अनुशासन और जिम्मेदारी को जीवन की धुरी माना; और दूसरी ओर है जनरेशन जेड (1997-2012), जो स्वतंत्रता, आत्म-अभिव्यक्ति और संतुलित जीवन को प्राथमिकता देती है।

जनरेशन क्स उस दौर की पीढ़ी है जिसने सीमित संसाधनों और अनिश्चितताओं के बीच जीवन को सुरक्षित बनाने का प्रयास किया। एक ही नौकरी में लंबे समय तक टिके रहना, समय पर वेतन मिलना और परिवार की ज़रूरतें पूरी करना ही सफलता का पैमाना था। पिता के लिए यह गर्व की बात होती थी कि बेटा किसी सरकारी या स्थायी निजी नौकरी में ‘सेट’ हो गया। माँ के लिए परिवार को एकजुट रखना और सामाजिक मर्यादाओं का पालन करना सर्वाेपरि था। उनके लिए जीवन का अर्थ था, सुरक्षा, सम्मान और सामाजिक स्वीकृति।

इसके विपरीत, जनरेशन जेड डिजिटल युग की संतान है। इस पीढ़ी ने इंटरनेट, स्मार्टफोन और वैश्विक संपर्कों के बीच आँखें खोली हैं। इनके लिए करियर केवल आय का साधन नहीं, बल्कि पहचान, रचनात्मकता और आत्म-संतोष का माध्यम है। यही कारण है कि आज पारंपरिक नौकरियों के साथ-साथ स्टार्टअप, फ्रीलांसिंग, कंटेंट क्रिएशन, सोशल इंटरप्रेन्योरशिप और गिग इकॉनमी जैसे विकल्प लोकप्रिय हो रहे हैं। वेतन और पद से अधिक अब वर्क-लाइफ बैलेंस, मानसिक स्वास्थ्य और उद्देश्यपूर्ण कार्य को महत्व दिया जा रहा है। यह वैचारिक अंतर केवल कार्यक्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवार के भीतर भी गहराई से महसूस किया जा सकता है।

आज के कई घरों में पिता-पुत्र के संवाद में यह टकराव दिखाई देता है, जहाँ पिता सरकारी नौकरी को जीवन की सबसे सुरक्षित राह मानते हैं, वहीं पुत्र जोखिम उठाकर स्टार्टअप या डिजिटल करियर चुनना चाहता है। इसी तरह माँ-बेटी या सास-बहू के रिश्तों में भी सोच का अंतर उभरता है। एक ओर परंपरा निभाने का दबाव, दूसरी ओर आत्मनिर्भरता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता की आकांक्षा। संयुक्त परिवारों में यह अंतर और स्पष्ट हो जाता है, जहाँ दादा-दादी अनुशासन और संस्कारों की बात करते हैं, जबकि पोते-पोतियाँ प्रश्न पूछते हैं, ‘क्यों?’ और ‘क्यों नहीं?’

शिक्षा के क्षेत्र में भी यह परिवर्तन साफ दिखाई देता है। पहले शिक्षक ज्ञान के एकमात्र स्रोत होते थे, आज वही भूमिका इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म निभा रहे हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि शिक्षक अप्रासंगिक हो गए हैं। बल्कि अब शिक्षक जानकारी देने वाले नहीं, बल्कि मार्गदर्शक, मेंटर और मूल्य-बोध विकसित करने वाले बनते जा रहे हैं। परिवार भी अब केवल परीक्षा परिणाम नहीं, बल्कि बच्चे की रुचि, मानसिक स्थिति और कौशल विकास पर ध्यान देने लगे हैं। यह बदलाव केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि एक वैश्विक प्रवृत्ति है।

जापान जैसे देश में, जहाँ जनरेशन एक्स ने दशकों तक कंपनी के प्रति पूर्ण निष्ठा और आजीवन नौकरी को आदर्श माना, आज वहाँ की युवा पीढ़ी कार्य-जीवन संतुलन और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे रही है। दक्षिण कोरिया में युवा पारंपरिक कॉर्पाेरेट संस्कृति से बाहर निकलकर स्टार्टअप और क्रिएटिव इंडस्ट्री की ओर बढ़ रहे हैं। यूरोप के कई देशों में चार-दिवसीय कार्य सप्ताह और पेड पैरेंटल लीव को नई पीढ़ी की माँग के रूप में अपनाया जा रहा है, ताकि परिवार और व्यक्तिगत जीवन को अधिक समय दिया जा सके।

नेपाल में युवा पारंपरिक राजनीति और कृषि आधारित जीवन से हटकर डिजिटल उद्यमिता और सामाजिक पारदर्शिता की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। वहीं, अमेरिका में जनरेशन जेड पारिवारिक रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित कर रही है, जहाँ माता-पिता बच्चों के ‘चुनाव’ को पहले से अधिक सम्मान देने लगे हैं, चाहे वह करियर हो या जीवनशैली।

भारत में भी यही मानसिकता धीरे-धीरे मजबूत हो रही है। नई पीढ़ी स्थिर जीवन की बजाय अर्थपूर्ण जीवन की तलाश में है। माता-पिता अब भी सरकारी नौकरी को सुरक्षा का प्रतीक मानते हैं, जबकि बच्चे डिजिटल प्लेटफॉर्म, सामाजिक परियोजनाओं और रचनात्मक कार्यों के ज़रिए समाज में सकारात्मक बदलाव लाना चाहते हैं। उनके लिए काम केवल रोज़ी-रोटी नहीं, बल्कि आत्म-अभिव्यक्ति और सामाजिक योगदान का माध्यम बन गया है।

इन सबके बीच यह समझना आवश्यक है कि यह वैचारिक अंतर संघर्ष नहीं, बल्कि संक्रमण है। हर नई पीढ़ी पुराने ढाँचों को चुनौती देती है, और यहीं से समाज में नवाचार जन्म लेता है। जनरेशन एक्स का अनुभव, अनुशासन और मूल्य जहाँ समाज की जड़ें हैं, वहीं जनरेशन जेड की ऊर्जा, तकनीकी समझ और प्रश्न पूछने की हिम्मत उसे भविष्य की ओर बढ़ाती है।
यदि इन दोनों पीढ़ियों के बीच संवाद मजबूत हो, घर के भीतर, कार्यस्थल पर और समाज में तो यह अंतर कमजोरी नहीं, बल्कि सामूहिक शक्ति बन सकता है। अनुभव दिशा देगा और नवाचार गति और यही संतुलन किसी भी समाज को केवल आगे ही नहीं, बल्कि ऊँचाई की ओर भी ले जाता है। विकास तब ही टिकाऊ होता है जब परंपरा और परिवर्तन टकराते नहीं, बल्कि संवाद करते हैं। और यही संवाद हमें यह सिखाता है कि हर पीढ़ी अपने समय की उपज होती है, एक बीज की तरह, जो अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है और फिर भी आकाश की ओर बढ़ने का साहस करता है।





