




शंकर सोनी.
छात्रसंघ चुनाव किसी भी विश्वविद्यालय में लोकतंत्र की पहली पाठशाला माने जाते हैं। युवा नेतृत्व यहीं से उभरता है, संघर्ष की समझ यहीं से विकसित होती है और विचारधाराओं की टकराहट भी यहीं सबसे पहले आकार लेती है। मगर जब यही चुनाव हिंसा, जातिवाद, बाहुबल और धनबल से ग्रसित हो जाएं, तब लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है। इसी पृष्ठभूमि में 2005 में भारत के सर्वाेच्च न्यायालय ने छात्रसंघ चुनावों को मर्यादा और मर्यादा के साथ संचालित करने हेतु लिंगदोह समिति का गठन किया। यह समिति छात्र राजनीति को अनुशासित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप थी। आज जब एक बार फिर छात्रसंघ चुनावों की बहाली की मांग हो रही है, तो यह जरूरी हो जाता है कि हम लिंगदोह समिति की सिफारिशों, उनकी प्रासंगिकता और प्रभाव की पुनर्समीक्षा करें।

दरअसल, साल 2005 तक आते कई विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव हिंसक, जातिवादी, धनबल-प्रभावित और राजनीतिक रूप से प्रेरित होते जा रहे थे। जिस पर चिंतित होकर सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा 7 दिसंबर 2005 को लिंगदोह कमेटी का गठन किया गया था। जे. एम. लिंगदोह दृ पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (अध्यक्ष) नियुक्त किया गया और उसमें सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. प्रीति सैनी व शिक्षाविद् डॉ. अनीता रामास्वामी को सदस्य रखा गया।

लिंगदोह कमेटी के मुख्य रूप से 10 सुझाव दिए। इनमें देश के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव में प्रशासन पूरी पारदर्शिता बरते। विश्वविद्यालयों द्वारा चुनाव संचालन की जिम्मेदारी ली जाए। चुनावों को प्रत्यक्ष मतदान द्वारा संपन्न किया जाए। निर्वाचन में बाहरी राजनीतिक दलों का हस्तक्षेप वर्जित किया गया। चुनाव में किसी भी तरह की हिंसा या विश्वविद्यालय के परिसर को पोस्टर्स और बैनर्स से बदरंग किया गया तो प्रत्याशी के खिलाफ निलंबन की कार्यवाही हो। अंडर ग्रेजुएट छात्र- चुनाव हेतु आयु सीमा 17 से 22 वर्ष तय की गई। पोस्ट ग्रेजुएट चुनाव हेतु आयु सीमा 24 से 25 साल के तय की गई। शोध छात्रों की चुनाव लड़ने के लिए उम्र सीमा 28 वर्ष अधिकतम रखी। कक्षाओं में छात्र छात्राओं की उपस्थिति 75 फीसदी कम से कम तय की गई। जिस छात्र छात्रा के विरुद्ध कोई आपराधिक मामला दर्ज हो उसे निर्वाचन हेतु अयोग्यता माना गया। चुनावी खर्च सीमा 5 हजार रुपए अधिकतम तय की गई इससे ज्यादा खर्च करने पर उम्मीदवार को अयोग्य माना जाएगा। विश्वविद्यालय और कॉलेज परिसर में उम्मीदवारों के पोस्टर्स और बैनर्स नहीं लगे होने चाहिए। परिसर बदरंग करने पर कैंडिडेट के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाए। जातीय और सम्प्रदाय के आधार पर वोट मांगने पर उम्मीदवारी निरस्त की जा सकती है।

लिंगदोह कमेटी ने रिपोर्ट में यह भी कहा कि छात्रसंघ चुनाव के दौरान हिंसा होती है, आमजन को परेशानी होती है तो सरकार चुनाव पर प्रतिबंध लगा सकती है। इसे सुप्रीम कोर्ट ने 22 सितंबर 2006 के आदेश द्वारा अनिवार्य रूप से लागू करने को कहा। लिंगदोह कमेटी की रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने छात्रसंघ चुनाव से रोक हटा दी थी और कमेटी के सुझावों के अनुसार ही चुनाव कराने के आदेश दिये। दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू जैसे संस्थानों में कई छात्र संगठनों ने कुछ सिफारिशों, विशेषकर आयु और खर्च की सीमा पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि यह छात्रों की लोकतांत्रिक भागीदारी को सीमित करता है।
-लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता व नागरिक सुरक्षा मंच के संस्थापक हैं



