


भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
जनशक्ति भवन, हनुमानगढ़ टाउन मजदूर एकजुटता और संघर्ष की गूंज से भर उठा। सीटू से सम्बद्ध एफसीआई पल्लेदार मजदूर यूनियन की विस्तृत बैठक यहां संपन्न हुई, जिसकी अध्यक्षता जिला अध्यक्ष कामरेड आत्मा सिंह ने की। जिलेभर से पहुंचे यूनियन कमेटियों के पदाधिकारी और सदस्यों ने इस बैठक में हिस्सा लिया। बैठक का प्रमुख एजेंडा था, आगामी एफसीआई जिला सम्मेलन की रूपरेखा तैयार करना और केंद्र सरकार की कथित मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ संघर्ष की नई राह तय करना। बैठक में सबसे ज्यादा गूंजा मुद्दा था एफसीआई (भारतीय खाद्य निगम) का निजीकरण। वक्ताओं ने भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया कि सरकार संगठित ढंग से एफसीआई को निजी हाथों में सौंपने की साजिश रच रही है।

मजदूर नेताओं का तर्क था कि निजीकरण का सीधा असर दो मोर्चों पर पड़ेगा, लाखों पल्लेदार और संविदा कर्मचारी बेरोज़गारी के मुहाने पर खड़े हो जाएंगे। सार्वजनिक वितरण प्रणाली का ढांचा चरमरा जाएगा, जिससे आम जनता को महंगे दामों पर अनाज खरीदना पड़ेगा। एफसीआई का निजीकरण किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं होगा। यह लड़ाई सिर्फ मजदूरों की नहीं बल्कि देश के हर आम आदमी की लड़ाई है।

बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि एफसीआई मजदूर यूनियन आने वाले दिनों में व्यापक आंदोलन छेड़ेगी। इसके तहत धरना-प्रदर्शन, रैलियां और सामूहिक विरोध कार्यक्रम आयोजित होंगे। जिला सम्मेलन को ऐतिहासिक बनाने के लिए विभिन्न समितियों का गठन भी किया गया।

यहां यह सवाल उठना लाज़मी है कि जब सरकार लगातार सार्वजनिक संस्थानों को निजी हाथों में सौंपने की राह पर है, तो क्या केवल धरना-प्रदर्शन से वह नीति बदलने को तैयार होगी? मजदूर संगठनों को शायद इस पर भी गंभीर रणनीति बनानी होगी कि संघर्ष का स्वरूप केवल प्रतीकात्मक न रह जाए, बल्कि नीति-निर्माण पर वास्तविक दबाव बना सके। बैठक में एक और बड़ा मुद्दा गूंजा, प्रदेशभर में चल रहा स्मार्ट मीटर विरोधी आंदोलन। वक्ताओं का कहना था कि स्मार्ट मीटर जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने की योजना है, जो गरीब और मध्यम वर्गीय उपभोक्ता को और संकट में धकेल देगी। यूनियन ने घोषणा की कि 18 अगस्त 2025 को एईएन कार्यालय के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया जाएगा। इसमें सीटू और एफसीआई यूनियन के कार्यकर्ता बड़ी संख्या में शामिल होंगे।

सामाजिक चिंतक ओम बिश्नोई कहते हैं, ‘स्मार्ट मीटर का मुद्दा सिर्फ तकनीकी बदलाव का नहीं बल्कि विश्वास और पारदर्शिता का भी है। उपभोक्ता मानते हैं कि इन मीटरों के जरिए बिजली कंपनियां मनमाने ढंग से बिल बढ़ा सकती हैं और आम आदमी को बिना सुने ठगा जा सकता है। इस संदर्भ में सरकार की संवादहीनता आलोचना का विषय बन रही है।’

नेताओं ने मजदूरों और आमजन से एकजुट होकर सरकार की जनविरोधी व पूंजीवादी नीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करने का आह्वान किया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने मजदूर व उपभोक्ता हितों की अनदेखी जारी रखी तो आंदोलन और उग्र किया जाएगा। अध्यक्ष आत्मा सिंह ने कहा, ‘मजदूर वर्ग की एकता ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। जब-जब मजदूर वर्ग संगठित हुआ है, तब-तब सबसे ताकतवर सरकारों को भी झुकना पड़ा है। आज समय आ गया है कि हम सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए संघर्ष करें।’

यह बैठक और इसमें पारित प्रस्ताव केवल मजदूरों का आक्रोश नहीं, बल्कि उस बढ़ती चिंता का प्रतीक हैं जो देश की आर्थिक नीतियों को लेकर आम जनता के बीच पनप रही है। निजीकरण की बहस महज नीतिगत सुधार नहीं बल्कि रोज़गार, सामाजिक सुरक्षा और खाद्य अधिकार से जुड़ी बुनियादी बहस है। स्मार्ट मीटर विवाद यह दर्शाता है कि तकनीक अगर जनहित के बजाय मुनाफे के लिए थोप दी जाए, तो वह सुविधा नहीं, परेशानी बन जाती है। प्रश्न यह भी है कि क्या मजदूर संगठनों का यह आंदोलन व्यापक जनसमर्थन जुटा पाएगा? और यदि जुटा भी लिया तो क्या सरकार इस आवाज़ को नीति-निर्माण के स्तर पर गंभीरता से लेगी?

