


डॉ. संतोष राजपुरोहित.
भारत की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए केवल बड़े उद्योग, आईटी सेक्टर या उच्च शिक्षित मानव संसाधन पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। वास्तविकता यह है कि भारत का एक बड़ा औद्योगिक आधार कम पढ़े-लिखे, अर्द्ध-कुशल और व्यावहारिक अनुभव से प्रशिक्षित श्रमिकों पर टिका हुआ है। देश के अनेक उत्पादन क्लस्टर ऐसे हैं जहाँ औपचारिक शिक्षा से अधिक हाथों से काम करने की दक्षता (स्किल बाई डूइंग), परंपरा और स्थानीय प्रशिक्षण निर्णायक भूमिका निभाते हैं। जालंधर, मोरबी और त्रिपुरा इसके प्रमुख उदाहरण हैं, किंतु भारत का औद्योगिक परिदृश्य ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है।

पंजाब का जालंधर खेल-सामान उद्योग का विश्वस्तरीय केंद्र है। यहाँ क्रिकेट बैट, फुटबॉल, हॉकी स्टिक, बॉक्सिंग ग्लव्स जैसे उत्पाद तैयार होते हैं। इन इकाइयों में कार्यरत अधिकांश श्रमिक 8वीं या 10वीं तक शिक्षित हैं। लकड़ी को आकार देना, चमड़े की सिलाई, फिनिशिंग और पॉलिश जैसे कार्य परंपरागत कारीगरी पर आधारित हैं। यही कम पढ़े-लिखे श्रमिक भारत को खेल-सामान के वैश्विक निर्यातक देशों में स्थान दिलाते हैं। यह क्लस्टर प्रमाण है कि औपचारिक शिक्षा की सीमित भूमिका के बावजूद कौशल आर्थिक मूल्य पैदा कर सकता है।

गुजरात का मोरबी सिरेमिक टाइल्स और सैनिटरीवेयर उद्योग का हृदयस्थल है। यहाँ 5वीं से 10वीं तक पढ़े श्रमिक भट्टियों, प्रेस मशीनों और पैकिंग यूनिट्स में कार्यरत हैं। उत्पादन प्रक्रिया अपेक्षाकृत तकनीकी है, किंतु प्रशिक्षण औपचारिक संस्थानों की बजाय कार्यस्थल पर ही मिलता है। उत्तर भारत से आए अप्रवासी श्रमिक इस क्लस्टर की रीढ़ हैं। मोरबी यह दर्शाता है कि सरल तकनीक और अनुभव आधारित प्रशिक्षण, कम शिक्षित श्रमिकों को भी औद्योगिक उत्पादन से जोड़ सकता है।

पूर्वाेत्तर भारत का त्रिपुरा बांस, हथकरघा और रबर-आधारित उद्योगों के लिए जाना जाता है। यहाँ प्राथमिक या माध्यमिक शिक्षा वाले ग्रामीण और जनजातीय श्रमिक बांस शिल्प, बुनाई और रबर प्रोसेसिंग में संलग्न हैं। ये उद्योग स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान पर आधारित हैं। त्रिपुरा का अनुभव बताता है कि स्थानीय संसाधन + पारंपरिक कौशल = टिकाऊ आजीविका और क्षेत्रीय विकास।

तमिलनाडु का तिरुप्पुर रेडीमेड गारमेंट्स का प्रमुख केंद्र है। यहाँ लाखों श्रमिक कटिंग, सिलाई, बटन लगाने और पैकिंग जैसे कार्यों में लगे हैं। अधिकांश श्रमिक सीमित औपचारिक शिक्षा वाले हैं, किंतु व्यावहारिक दक्षता के बल पर यह शहर भारत के वस्त्र निर्यात में महत्वपूर्ण योगदान देता है। तिरुप्पुर दर्शाता है कि कम पढ़े-लिखे श्रमिक भी वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सा बन सकते हैं।

उत्तर प्रदेश का फिरोज़ाबाद कांच और चूड़ी उद्योग के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ पीढ़ियों से चले आ रहे कौशल के आधार पर श्रमिक काम करते हैं। इसी तरह राजस्थान का भीलवाड़ा वस्त्र उद्योग में जाना जाता है, जहाँ पावरलूम और प्रोसेसिंग यूनिट्स में कम पढ़े-लिखे श्रमिक कार्यरत हैं। दोनों उदाहरण बताते हैं कि परंपरागत उद्योग आधुनिक बाज़ार से जुड़कर भी टिके रह सकते हैं।
महाराष्ट्र का भिवंडी और इचलकरंजी पावरलूम उद्योग के प्रमुख केंद्र हैं। यहाँ ग्रामीण और अप्रवासी श्रमिक सीमित शिक्षा के बावजूद कपड़ा उत्पादन में लगे हैं। ये क्लस्टर श्रम-प्रधान औद्योगिकीकरण के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
गुजरात का अलंग शिप ब्रेकिंग यार्ड विश्व का सबसे बड़ा जहाज़ तोड़ने का केंद्र है। यहाँ कार्यरत श्रमिक प्रायः कम पढ़े-लिखे हैं और शारीरिक श्रम पर आधारित जोखिमपूर्ण कार्य करते हैं। यद्यपि सुरक्षा और पर्यावरणीय चुनौतियाँ हैं, फिर भी यह उद्योग हज़ारों लोगों को रोज़गार देता है।
इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट है कि भारत का औद्योगिक विकास केवल उच्च शिक्षा और पूँजी-प्रधान मॉडल पर निर्भर नहीं है। ये क्लस्टर लेबर इंटेंसिव ग्रोथ, एमएसएमई विस्तार, निर्यात आय और क्षेत्रीय संतुलन में अहम भूमिका निभाते हैं। साथ ही, ये ग्रामीण, अप्रवासी और सीमांत श्रमिकों को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ते हैं, जिससे समावेशी विकास को बढ़ावा मिलता है।
जालंधर से तिरुप्पुर, मोरबी से अलंग और त्रिपुरा से फिरोज़ाबाद तक फैले ये उत्पादन क्लस्टर यह सिद्ध करते हैं कि कम पढ़े-लिखे श्रमिक भारत की आर्थिक शक्ति हैं, कमजोरी नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि इनके कौशल को बेहतर तकनीक, सुरक्षित कार्य-स्थितियों, सामाजिक सुरक्षा और बाज़ार तक बेहतर पहुँच से जोड़ा जाए। यदि ऐसा किया गया, तो यही श्रमिक भारत के औद्योगिक भविष्य के सबसे मज़बूत स्तंभ सिद्ध होंगे।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं



