



डॉ. संतोष राजपुरोहित.
आधुनिक विश्व में आर्थिक विकास को प्रायः प्रगति, समृद्धि और जीवन-स्तर में सुधार का पर्याय माना जाता है। ऊँची इमारतें, तकनीकी नवाचार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और बढ़ता सकल घरेलू उत्पाद इस विकास की बाहरी पहचान हैं। किंतु इन चमकदार आँकड़ों के पीछे एक कठोर और असहज सच्चाई छिपी है, आय और संपत्ति की गहराती असमानता। प्रस्तुत आँकड़े न केवल वैश्विक स्तर पर बल्कि भारत जैसे उभरते देश में भी इस असमानता की भयावह तस्वीर सामने रखते हैं।
वैश्विक स्तर पर यदि संपत्ति के वितरण को देखा जाए तो स्थिति अत्यंत असंतुलित दिखाई देती है। दुनिया के सबसे अमीर 10 प्रतिशत लोगों के पास वैश्विक संपत्ति का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा केंद्रित है, जबकि निचले 50 प्रतिशत लोगों के हिस्से में मात्र 2 प्रतिशत संपत्ति आती है। यह तथ्य अपने-आप में दर्शाता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में संपत्ति का संकेंद्रण किस हद तक कुछ हाथों में सिमट चुका है। मध्य वर्ग, जो कुल आबादी का लगभग 40 प्रतिशत है, उसके पास भी केवल 23 प्रतिशत संपत्ति है। स्पष्ट है कि आर्थिक विकास का लाभ समान रूप से वितरित नहीं हो रहा, बल्कि वह एक संकीर्ण वर्ग तक सीमित होता जा रहा है।
यदि इस वैश्विक परिदृश्य को भारत के संदर्भ में देखा जाए, तो स्थिति कुछ मामलों में और भी गंभीर प्रतीत होती है। आँकड़ों के अनुसार भारत के सबसे धनी 10 प्रतिशत लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा है। वहीं, देश की आधी आबादी अर्थात निचले 50 प्रतिशत लोगों के पास केवल 6.4 प्रतिशत संपत्ति ही उपलब्ध है। यह असमानता तब और अधिक चौंकाने वाली हो जाती है जब हम देखते हैं कि केवल शीर्ष 1 प्रतिशत लोगों के पास ही 40.1 प्रतिशत राष्ट्रीय संपत्ति केंद्रित है। यह तथ्य भारतीय समाज में बढ़ते आर्थिक ध्रुवीकरण को उजागर करता है।

आय और संपत्ति की यह असमानता केवल आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि इसके गहरे सामाजिक और राजनीतिक परिणाम भी हैं। जब समाज का एक बड़ा हिस्सा सीमित संसाधनों में जीवन यापन करता है, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं तक उसकी पहुँच भी सीमित हो जाती है। परिणामस्वरूप सामाजिक गतिशीलता रुक जाती है और गरीबी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होती रहती है। दूसरी ओर, संपन्न वर्ग के पास बेहतर शिक्षा, तकनीक और अवसरों की उपलब्धता होती है, जिससे असमानता और अधिक गहराती जाती है।

भारत जैसे विकासशील देश में यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि यहाँ जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा अभी भी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है, जहाँ आय अस्थिर और सामाजिक सुरक्षा न्यूनतम है। आर्थिक सुधारों, उदारीकरण और वैश्वीकरण के बाद भले ही उच्च वर्ग की आय और संपत्ति में तीव्र वृद्धि हुई हो, लेकिन इसका लाभ निचले वर्ग तक अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुँच सका। शहरी-ग्रामीण अंतर, डिजिटल विभाजन और क्षेत्रीय असमानताएँ इस समस्या को और जटिल बनाती हैं।

आय असमानता का एक और गंभीर प्रभाव लोकतंत्र पर पड़ता है। जब संपत्ति और आर्थिक शक्ति कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित हो जाती है, तो नीति-निर्माण पर भी उन्हीं का प्रभाव बढ़ जाता है। इससे जनहित की नीतियों के स्थान पर पूँजी-हितैषी नीतियों को प्राथमिकता मिलने का खतरा रहता है। लंबे समय में यह सामाजिक असंतोष, अविश्वास और अस्थिरता को जन्म दे सकता है।

इस चुनौती से निपटने के लिए बहुआयामी प्रयासों की आवश्यकता है। प्रगतिशील कर प्रणाली, सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ, गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ, तथा रोजगार सृजन पर आधारित समावेशी विकास मॉडल इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। साथ ही, पारदर्शी शासन और जवाबदेह संस्थाएँ यह सुनिश्चित कर सकती हैं कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचे।
प्रस्तुत आँकड़े हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि केवल विकास की दर पर्याप्त नहीं है, बल्कि विकास की प्रकृति और उसका वितरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि आय और संपत्ति की असमानता को नियंत्रित नहीं किया गया, तो आर्थिक प्रगति के बावजूद सामाजिक न्याय और समावेशी विकास का लक्ष्य अधूरा ही रह जाएगा। अतः समय की माँग है कि विकास को मानव-केंद्रित बनाते हुए समानता और न्याय को आर्थिक नीति के केंद्र में रखा जाए।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं



