




भटनेर पोस्ट डेस्क.
तेजी से बदलते डिजिटल युग में जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) मानव जीवन के लगभग हर क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रही है, तब मानवीय मूल्यों और सामाजिक संतुलन का प्रश्न और भी गंभीर हो गया है। इसी विमर्श को केंद्र में रखते हुए शैक्षिक फाउंडेशन एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में डॉ. अंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में राजस्थान आर्थिक परिषद के पूर्व अध्यक्ष डॉ. संतोष राजपुरोहित ने अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया।

सम्मेलन का विषय ‘डिजिटल समाज और मानवीय मूल्य: एआई युग में एकात्म मानव दर्शन की प्रासंगिकता’ रहा। इस सम्मेलन में देश-विदेश से आए शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, सामाजिक चिंतकों और नीति विशेषज्ञों ने भाग लिया और डिजिटल परिवर्तन के सामाजिक, आर्थिक और नैतिक प्रभावों पर गंभीर विचार-विमर्श किया। आयोजन का उद्देश्य केवल तकनीकी प्रगति की चर्चा तक सीमित नहीं था, बल्कि यह समझना भी था कि तेज रफ्तार डिजिटल बदलाव के बीच मानव केंद्रित दृष्टिकोण कैसे सुरक्षित रखा जाए।

डॉ. संतोष राजपुरोहित ने अपने शोधपत्र में डिजिटल परिवर्तन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को विकास की अनिवार्य प्रक्रिया बताते हुए कहा कि तकनीक अपने आप में न तो अच्छी है और न ही बुरी, उसका मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि वह मानव कल्याण में किस हद तक सहायक है। उन्होंने तर्क दिया कि एआई आधारित प्रणालियां यदि केवल उत्पादन, मुनाफे और दक्षता तक सीमित रहीं, तो सामाजिक विषमता, मानवीयता और गहरी हो सकती है।

अपने विश्लेषण में डॉ. राजपुरोहित ने एकात्म मानव दर्शन को समकालीन संदर्भों में पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि एकात्म मानव दर्शन केवल दार्शनिक अवधारणा नहीं, बल्कि ऐसा समग्र दृष्टिकोण है, जो व्यक्ति, समाज, प्रकृति और तकनीक के बीच संतुलन स्थापित करता है। एआई युग में यह दर्शन नीति निर्माण, शिक्षा प्रणाली और आर्थिक विकास के मॉडल को अधिक मानवीय और समावेशी बनाने में मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।

शोधपत्र में यह भी रेखांकित किया गया कि डिजिटल समाज में डेटा, एल्गोरिद्म और स्वचालन की भूमिका बढ़ने के साथ-साथ निर्णय प्रक्रियाएं मशीनों के हाथ में जा रही हैं। ऐसे में नैतिकता, जवाबदेही और मानवीय संवेदना को बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। डॉ. राजपुरोहित ने सुझाव दिया कि एआई के विकास और उपयोग में मानवीय मूल्यों को मूल आधार बनाया जाना चाहिए, ताकि तकनीक समाज को नियंत्रित करने का माध्यम न बने, बल्कि समाज के सशक्तिकरण का साधन बने।

सम्मेलन में उपस्थित विद्वानों और विशेषज्ञों ने डॉ. राजपुरोहित के विचारों की सराहना करते हुए कहा कि उनका शोधपत्र समकालीन अकादमिक विमर्श के लिए अत्यंत उपयोगी है। कई प्रतिभागियों ने इसे तकनीक और दर्शन के बीच सेतु स्थापित करने वाला अध्ययन बताया, जो भविष्य की नीतियों और शोध दिशाओं को प्रभावित कर सकता है। उल्लेखनीय है कि डॉ. संतोष राजपुरोहित का अकादमिक अनुभव और शोध योगदान व्यापक रहा है। वे अब तक 8 अंतरराष्ट्रीय और 46 राष्ट्रीय सेमिनारों में सहभागिता कर चुके हैं, जो उनकी निरंतर सक्रियता और बौद्धिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। वर्तमान में वे भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं तथा इससे पूर्व राजस्थान आर्थिक परिषद के अध्यक्ष के रूप में भी महत्वपूर्ण दायित्व निभा चुके हैं।





