





डॉ. महावीर शर्मा.
राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय द्वारा हाल ही में लिया गया निर्णय, जिसमें एमबीबीएस, डेंटल, नर्सिंग और फार्मेसी के विद्यार्थियों को अपनी परीक्षाएँ हिंदी, अंग्रेज़ी या दोनों भाषाओं के मिश्रण में देने की अनुमति दी गई है, चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा और साहसिक परिवर्तन है। इसका उद्देश्य ग्रामीण और हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों को भाषा की कठिनाई से मुक्त करना और उन्हें समान अवसर देना है। यह पहल निश्चय ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी 2020) की भावना के अनुरूप है, जो मातृभाषा में शिक्षा को प्रोत्साहित करती है। किंतु इसके दूरगामी प्रभावों पर गंभीर और संतुलित विचार आवश्यक है, क्योंकि चिकित्सा शिक्षा केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर मान्य वैज्ञानिक भाषा और मानकों पर आधारित है।

हर बिंदु के दो पहलू होते हैं, सकारात्मक और नकारात्मक। इस निर्णय के तहत ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले अनेक मेधावी छात्र अंग्रेज़ी में अपनी बात स्पष्ट रूप से नहीं रख पाते। हिंदी माध्यम की सुविधा से उन्हें आत्मविश्वास मिलेगा और उनका प्रदर्शन सुधरेगा। राजस्थान के दूरदराज़ इलाकों में अनेक प्रतिभावान छात्र हैं, जो अंग्रेज़ी के डर से मेडिकल शिक्षा से दूर रह जाते हैं। यह नीति उन्हें मुख्यधारा में लाने का मार्ग प्रशस्त करेगी। यह निर्णय शिक्षा के लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक सकारात्मक प्रयास है, जिससे शिक्षा केवल अभिजात वर्ग तक सीमित न रह जाए।

दूसरी तरफ कुछ दिक्कतें भी हैं, जिन पर चर्चा लाजिमी है। मसलन, चिकित्सा विज्ञान की अधिकांश शब्दावली लैटिन और अंग्रेज़ी में है। हिंदी में इनके सटीक और एकरूप अर्थ विकसित करने की प्रक्रिया अभी प्रारंभिक अवस्था में है। गलत अनुवाद या अस्पष्ट शब्द चिकित्सा शिक्षण की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। विश्व की अधिकांश चिकित्सा पुस्तकों, शोध पत्रों और गाइडलाइनों की भाषा अंग्रेज़ी है। हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों को नवीनतम ज्ञान तक समान पहुंच नहीं मिल पाएगी। हिंदी माध्यम से प्रशिक्षित डॉक्टरों को विदेशों में उच्च शिक्षा या रोजगार के अवसरों में कठिनाइयाँ होंगी। चिकित्सा एक वैश्विक विज्ञान है, और इसके शिक्षार्थियों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार करना अनिवार्य है। देश के कई हिस्सों में हिंदी भाषा का प्रयोग सीमित है। यदि शिक्षा व परीक्षा का माध्यम अलग-अलग राज्यों में भिन्न होगा, तो डॉक्टरों का अंतरराज्यीय स्थानांतरण और पेशेवर तालमेल कठिन हो जाएगा। यदि शिक्षण, पुस्तकें और अध्यापक अंग्रेज़ी में ही बने रहें और केवल परीक्षा का माध्यम बदला जाए, तो यह नीति अधूरा और भ्रमित करने वाला कदम सिद्ध होगी।

इस मसले पर आईएमए राजस्थान का सुझाव और दृष्टिकोण विचारार्थ है। मसलन, पहले वर्ष में विद्यार्थियों को हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों माध्यमों में पढ़ाई की अनुमति देकर, धीरे-धीरे अंग्रेज़ी की ओर संक्रमण सुनिश्चित किया जाए। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को देशभर में उपयोग योग्य मानकीकृत हिंदी मेडिकल टर्मिनोलॉजी तैयार करनी चाहिए। सभी मेडिकल कॉलेजों में छात्रों के लिए अंग्रेज़ी भाषा, मेडिकल शब्दावली और संचार कौशल पर विशेष कोर्स अनिवार्य किए जाएँ। गुणवत्तापूर्ण हिंदी चिकित्सा पुस्तकों का निर्माण एवं उनकी आधिकारिक मान्यता सुनिश्चित की जाए। भाषा चाहे जो भी हो, शिक्षण का स्तर, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नैतिक मानक अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता के अनुरूप बनाए रखना सर्वाेच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

आरयूएचएस का यह कदम सद्भावना से प्रेरित और छात्र हित में लिया गया निर्णय है, परंतु इसकी सफलता तभी संभव है जब इसे व्यवस्थित योजना, समन्वित नीति और गुणवत्तापूर्ण शैक्षिक संसाधनों के साथ लागू किया जाए। भाषा शिक्षा का माध्यम है, बाधा नहीं। हमें ऐसा मॉडल विकसित करना चाहिए जिसमें विद्यार्थी हिंदी में सहजता से सीखें, किंतु साथ ही अंग्रेज़ी में दक्ष होकर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनें। आईएमए राजस्थान का मानना है कि समावेशिता और उत्कृष्टता, दोनों को संतुलित रखकर ही चिकित्सा शिक्षा को सशक्त और विश्वस्तरीय बनाया जा सकता है।
-लेखक आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं






