



गोपाल झा
वक्त को हमने बड़े इत्मीनान से तीन हिस्सों में बाँट रखा है। अतीत, वर्तमान और भविष्य। सुनने में यह बँटवारा बहुत सलीकेदार लगता है, मगर ज़िंदगी इतनी तहज़ीब से नहीं चलती। ज़िंदगी तो हर पल में साँस लेती है, हर लम्हे में अपनी मौजूदगी दर्ज कराती है। अफ़सोस यह है कि इंसान या तो गुज़रे कल की यादों में उलझा रहता है या आने वाले कल के वहम में घिरा रहता है। जो सामने है, जो हाथ में है, वर्तमान? उसे जीने की फ़ुर्सत ही नहीं निकालता।

अतीत की अपनी अदा है। अगर बीता वक्त अच्छा रहा हो तो आदमी फ़ख़्र से फूल जाता है, और अगर उसमें नाकामी, दर्द या कड़वाहट रही हो तो वह अफ़सोस और मलाल का बोझ ढोता फिरता है। कुछ लोग तो पुरानी तकलीफ़ों को ऐसे सँजोकर रखते हैं जैसे कोई कीमती विरासत हो। बार-बार उन्हें याद करते हैं, कुरेदते हैं, और फिर कहते हैं कि दिल भारी रहता है। सच तो यह है कि अतीत को याद करते-करते हम वर्तमान को भी खो देते हैं। जो बीत गया, वह लौटकर नहीं आने वाला, लेकिन उसकी परछाईं अगर हावी हो जाए तो आज भी सूना लगने लगता है।

भविष्य की कहानी और भी दिलचस्प है। जिसे हमने देखा नहीं, जाना नहीं, समझा नहीं, उसी को लेकर सबसे ज़्यादा खौफ़ पाले रहते हैं। न जाने किस बात की घबराहट, किस अनहोनी का डर। दिल में अजीब-अजीब वहम जन्म लेते रहते हैं। इस अनिश्चित भविष्य के डर में इंसान आज की राहत, आज की मुस्कान और आज की चैन की नींद तक कुर्बान कर देता है। सोचने वाली बात यह है कि जो सामने नहीं है, उसके लिए इतनी फिक्र; और जो सामने है, उसके लिए इतनी बेपरवाही क्यों?

हकीकत बड़ी सीधी है, इंसान के पास जीने के लिए सिर्फ़ वर्तमान है। यही वह लम्हा है जिसमें कुछ किया जा सकता है, कुछ बदला जा सकता है। अगर हम आज को दिल से महसूस नहीं करते, हर पल का मज़ा नहीं लेते, तो यक़ीन मानिए, आने वाला कल भी बेहतर नहीं होगा। क्योंकि कल कोई अलग दुनिया नहीं है, वह आज से ही बनता है। जिसे जीना नहीं आता, उसका भविष्य भी बिखरा हुआ ही रहेगा।

दुनिया में बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हें जीने का सलीका नहीं आया। चेहरे पर मायूसी, बातों में शिकवा और दिल में हमेशा एक अधूरी सी कसक। जबकि हर किसी को दिन में बराबर चौबीस घंटे मिलते हैं। फर्क बस इतना है कि कोई इन घंटों की क़द्र करता है और कोई उन्हें यूँ ही ज़ाया कर देता है। कामयाब लोग हर लम्हे का हिसाब रखते हैं। वे अपनी ज़िंदगी को तरतीब में रखते हैं, हर काम के लिए एक नक़्शा बनाते हैं और उसे पूरी शिद्दत से अमल में लाते हैं। यही उनकी कामयाबी का राज़ है, कोई करिश्मा नहीं, सिर्फ़ अनुशासन और मेहनत।

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनके पास सब कुछ होता है, दौलत, शोहरत, सहूलियतें, फिर भी दिल बेचैन रहता है। भविष्य की फिक्र उन्हें चैन से जीने नहीं देती। ऐसे लोग कभी खुश नहीं रह सकते। क्योंकि खुशी किसी भौतिक चीज़ से नहीं मिलती। खुशी तो एहसास का नाम है, नज़र का मामला है। इसे खरीदना नहीं पड़ता, इसे महसूस करना पड़ता है। यह फैसला हर इंसान को खुद करना होता है।

महाभारत में यक्ष और युधिष्ठिर का संवाद इस सच्चाई को बड़े खूबसूरत ढंग से बयान करता है। मृत्यु निश्चित जानते हुए भी इंसान का उससे डरना सबसे बड़ा ताज्जुब है। जब जन्म और मृत्यु हमारे हाथ में नहीं, तो फिर उनके डर में ज़िंदगी क्यों गँवाई जाए? हर धर्म यही सिखाता है कि जो हमारे बस में है, वही हमें ईमानदारी से करना चाहिए और वह है वर्तमान को पूरे जोश, उमंग और सुकून के साथ जीना।
मृत्यु से डरना नादानी है, और ज़िंदगी से मुँह मोड़ना उससे भी बड़ी भूल। किसी शायर ने बिल्कुल ठीक कहा है,
लाश भी इसलिए तैरती रह गई,
क्योंकि डूबने के लिए ज़िंदगी चाहिए।
ज़िंदगी है तो उसे आज में जियो, अभी में जियो। यही अक़्लमंदी है, और यही ज़िंदगी का असली हुनर। बेशक।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं







