



डॉ. अर्चना गोदारा.
इतना मुश्किल भी नहीं है, अपनों को गले लगाना। लगा कर तो देखिए बड़ा सुकून मिलता है। जी हां! करके तो देखिए, क्योंकि भागदौड़, तनाव और अकेलेपन से भरी आधुनिक जीवनशैली में मनुष्य ने बहुत कुछ पा लिया है, लेकिन सबसे ज़रूरी चीज़ मानवीय स्पर्श, धीरे-धीरे खोता जा रहा है। ऐसे समय में ‘हग थैरेपी’ यानी गले लगाने की चिकित्सा एक साधारण, लेकिन अत्यंत प्रभावशाली उपाय के रूप में सामने आई है। यह कोई चमत्कारी दवा नहीं, बल्कि मानव स्वभाव में निहित वह संवेदना है, जो बिना शब्दों के भी बहुत कुछ कह जाती है।

गले लगाना केवल एक सामाजिक व्यवहार नहीं, बल्कि एक जैविक और मानसिक प्रक्रिया है। जब दो लोग एक-दूसरे को स्नेहपूर्वक आलिंगन में लेते हैं, तो शरीर में ऑक्सीटोसिन नामक हार्माेन का स्राव होता है, जिसे ‘लव हार्माेन’ या ‘बॉन्डिंग हार्माेन’ कहा जाता है। यह हार्माेन तनाव को कम करता है, दिल की धड़कन को संतुलित करता है और व्यक्ति को भावनात्मक सुरक्षा का अनुभव कराता है। यही कारण है कि एक सच्चा आलिंगन कई बार उन भावनाओं को शांत कर देता है, जिन्हें शब्द भी नहीं सुलझा पाते।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, आज के समय में अवसाद, चिंता और भावनात्मक थकान तेजी से बढ़ रही है। सोशल मीडिया और डिजिटल संवाद ने लोगों को जोड़ा तो है, लेकिन वास्तविक भावनात्मक निकटता कम कर दी है। ऐसे में हग थैरेपी एक मानवीय पुनर्संयोजन का काम करती है। यह व्यक्ति को यह एहसास दिलाती है कि वह अकेला नहीं है, कोई है जो बिना शर्त उसे स्वीकार करता है। कई अध्ययनों में यह पाया गया है कि नियमित रूप से स्नेहपूर्ण आलिंगन पाने वाले लोगों में आत्मविश्वास अधिक होता है और वे मानसिक रूप से अधिक संतुलित रहते हैं।

हग थैरेपी का प्रभाव केवल मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सकारात्मक असर शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। यह रक्तचाप को नियंत्रित करने में मदद करती है, प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाती है और नींद की गुणवत्ता में सुधार लाती है। बुज़ुर्गों, बच्चों और अकेलेपन से जूझ रहे लोगों के लिए यह विशेष रूप से लाभकारी मानी जाती है। कई देशों में अब अस्पतालों, वृद्धाश्रमों और मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों में थेरेप्यूटिक हगिंग को सहायक उपचार के रूप में अपनाया जा रहा है।
हालाँकि, हग थैरेपी का एक महत्वपूर्ण पक्ष सम्मति और संवेदनशीलता भी है। गले लगाना तभी उपचार बनता है, जब वह स्वेच्छा, सम्मान और विश्वास के साथ किया जाए। बिना अनुमति या असहज स्थिति में किया गया स्पर्श सकारात्मक के बजाय नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम आलिंगन को केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार भावनात्मक संवाद के रूप में समझें।

भारतीय संस्कृति में आलिंगन कोई नई अवधारणा नहीं है। परिवारों में बच्चों को गले लगाना, दुख में किसी को थाम लेना या खुशी में बाहों में भर लेना हमारी परंपरा का हिस्सा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि आधुनिक जीवन में हम इन सहज मानवीय अभिव्यक्तियों को भूलते जा रहे हैं। हग थैरेपी हमें उसी भूली हुई संवेदना की ओर लौटने का निमंत्रण देती है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि कभी-कभी सबसे गहरी चिकित्सा किसी दवा, मशीन या सलाह में नहीं, बल्कि एक सच्चे आलिंगन में छिपी होती है। एक ऐसा आलिंगन, जो कहता है, ‘मैं तुम्हारे साथ हूँ।’ शायद यही वह सरल, लेकिन शक्तिशाली संदेश है, जिसकी आज की दुनिया को सबसे ज्यादा ज़रूरत है।
कुछ पल की मुस्कान, कुछ देर का सहारा,
एक आलिंगन जो थका मन फिर से सँवार दे।
कभी हँसी में, कभी ख़ामोशी में सिमटकर,
गले लगना भी इलाज़ है, ये एहसास जगा दे।
-लेखिका राजकीय एनएमपीजी कॉलेज में सहायक आचार्य हैं


