



शंकर सोनी.
भारतीय राजनीति का चेहरा तेज़ी से बदल रहा है। विकास, विचारधारा और वर्ग की राजनीति अब हाशिये पर जाती दिख रही है, जबकि धर्म केंद्र में आ चुका है। आज की राजनीति का कड़वा सच यही है कि वोटर अब योजनाओं से पहले पहचान देख रहा है और पहचान का सबसे सशक्त औज़ार बन गया है धर्म। आज़ादी के बाद लगभग सात दशकों तक कांग्रेस सत्ता के केंद्र में रही। उसके साथ या उसके साए में वामपंथी और समाजवादी दल भी सक्रिय रहे, लेकिन वे कभी कांग्रेस की छाया से बाहर निकलकर निर्णायक ताकत नहीं बन पाए। समय बदला, परिस्थितियां बदलीं और उसी खाली जगह में भारतीय जनता पार्टी ने हिंदू धर्म को राजनीतिक आधार बनाकर अपनी राह बनाई। भाजपा ने यह समझ लिया कि बिखरे हुए हिंदू मतदाताओं को एक सांस्कृतिक-सामाजिक पहचान के सूत्र में पिरोया जा सकता है। राम मंदिर आंदोलन और बाद में राम मंदिर निर्माण ने इस रणनीति को ठोस आधार दिया। आज यह चर्चा आम है कि राम मंदिर के बाद भाजपा के हिंदू वोट बैंक में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है।

इसके उलट वामपंथी दल, जो लंबे समय तक खुद को धर्मनिरपेक्षता का सबसे शुद्ध प्रतिनिधि मानते रहे, अब सिमटते जा रहे हैं। धर्म से दूरी उनकी वैचारिक मजबूरी थी, लेकिन बदलते राजनीतिक मौसम में यही दूरी उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई। अब राजनीति के गलियारों में धर्म के आधार पर मतदाताओं के ध्रुवीकरण का असर साफ़ दिखाई दे रहा है। इसी पृष्ठभूमि में पश्चिम बंगाल की राजनीति एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। लंबे समय तक अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप झेलने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अब स्पष्ट रूप से ‘मंदिर कूटनीति’ की ओर बढ़ती दिख रही हैं। यह बदलाव केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक भी माना जा रहा है।

तृणमूल कांग्रेस सरकार ने दीघा में लगभग 250 करोड़ रुपये की लागत से पुरी के जगन्नाथ मंदिर की तर्ज पर एक भव्य जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कराया है। यह केवल एक धार्मिक संरचना नहीं, बल्कि एक सियासी संदेश भी है। इसी कड़ी में न्यू टाउन, कोलकाता में 262 करोड़ रुपये के ‘दुर्गा आंगन’ प्रोजेक्ट की नींव रखी गई है, जिसे एक बड़े सांस्कृतिक और धार्मिक परिसर के रूप में विकसित किया जाएगा।

यहीं बात खत्म नहीं होती। दुर्गा पूजा समितियों को दी जाने वाली सरकारी सहायता राशि को बढ़ाकर 1.10 लाख रुपये प्रति समिति कर दिया गया है। पश्चिम बंगाल में लगभग 40 हजार दुर्गा पूजा समितियां हैं। इसका मतलब है कि इस एक फैसले से ही राज्य के खजाने पर करीब 500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। इसके अलावा गंगासागर मेले को सुगम बनाने के लिए 1,700 करोड़ रुपये के ब्रिज प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है और सिलीगुड़ी में भव्य महाकाल मंदिर के निर्माण की घोषणा भी की जा चुकी है।

ये सभी कदम साफ संकेत देते हैं कि ममता बनर्जी अब बंगाल की हिंदू भावनाओं को सीधे संबोधित करना चाहती हैं। लेकिन राजनीति में हर बदलाव अवसर के साथ जोखिम भी लाता है, और दीदी का यह दांव भी अपवाद नहीं है। भाजपा के खिलाफ जो सवाल खड़े किए जाते रहे हैं कि बेरोजगारी बढ़ रही है, बुनियादी ढांचा कमजोर है, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य की हालत संतोषजनक नहीं है, वही सवाल अब ममता सरकार पर भी उठ सकते हैं। विपक्ष यह पूछने में देर नहीं लगाएगा कि जब राज्य में रोजगार और उद्योग की हालत खराब है, तब सरकार मंदिरों और धार्मिक आयोजनों पर अरबों रुपये क्यों खर्च कर रही है।
दूसरी ओर, यह बदलाव वोटों के बिखराव का कारण भी बन सकता है। यदि मुस्लिम समुदाय को यह महसूस हुआ कि उनकी अनदेखी हो रही है या सरकार का झुकाव बदल गया है, तो वे कांग्रेस, वामपंथ या किसी अन्य विकल्प की ओर रुख कर सकते हैं। इससे भाजपा को अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है, क्योंकि विपक्षी वोटों का विभाजन उसके रास्ते को और आसान बना देगा।
उधर, हिंदू मतदाता भी इस रणनीति को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। वे ममता बनर्जी के इस हृदय परिवर्तन को केवल चुनावी हथकंडा मानकर भाजपा की ओर झुक सकते हैं। यानी दीदी जिस वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही हैं, वही वोट बैंक उनके हाथ से फिसल भी सकता है।

स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति एक निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुकी है। ममता बनर्जी की मंदिर कूटनीति उन्हें हिंदू मतदाताओं के करीब लाएगी या यह दांव उलटा पड़ेगा, इसका फैसला आने वाला समय करेगा। फिलहाल इतना तय है कि बंगाल अब वही बंगाल नहीं रहा, जहां धर्म राजनीति के हाशिये पर था। अब यहां भी सियासत की धुरी धीरे-धीरे मंदिर की परिक्रमा करने लगी है।
-लेखक पेशे से अधिवक्ता व नागरिक सुरक्षा मंच के संस्थापक अध्यक्ष हैं


