



गोपाल झा.
कभी अखबार थे सत्य। हर शब्द था प्रमाण। जनता करती थी विश्वास। पत्रकारिता थी आस्था। वह दौर था स्वर्णिम। जब खबरें थीं जिम्मेदार। जब शब्दों में था विवेक। जब कलम थी प्रतिबद्ध। अब वही कलम कांपती है। सत्य से नाता टूट गया। विश्वसनीयता की नींव हिल गई। टीवी चैनल बन गए बाज़ार। खबरें बिकती हैं चीखों में। संवेदना गुम है कोलाहल में। हर एंकर बना है अभिनेता। हर बहस बन गई रंगमंच।

धर्मेंद्र के नाम पर शर्म आई। एक चैनल ने हद कर दी। ‘सबसे तेज़’ बना ‘सबसे फेक’। बिना पुष्टि दी मौत की खबर। जनता ने मान भी लिया। श्रद्धांजलि की होड़ लगी। सोशल मीडिया हुआ श्मशान। राजनाथ सिंह तक चूक गए। परिजन बोले-जीवित हैं धर्मेंद्र। डॉक्टर बोले-सेहत सुधर रही। फिर भी लोग लिखते रहे शोकगीत। क्या यही संवेदना बची है? क्या यही सभ्यता का चेहरा है?

एक जीवित व्यक्ति को ‘मरण’ घोषित कर देना। यह भूल नहीं, अपराध है। यह पत्रकारिता नहीं, पाप है। मीडिया को अब सोचना होगा। ‘पहले खबर’ की अंधी दौड़ रोकनी होगी। सत्य से पहले सनसनी नहीं चलेगी। हर खबर में पुष्टि जरूरी है। हर शब्द में जिम्मेदारी जरूरी है। कलम अगर विवेक खो दे, तो वह हथियार बन जाती है। और हथियार केवल नाश करता है।

सोशल मीडिया भी निर्दाेष नहीं। हर हाथ में फोन है। हर व्यक्ति है प्रसारक। पर विवेक कहीं खो गया। लोग बिना सोचे साझा करते हैं। बिना जांच श्रद्धांजलि देते हैं। बिना सत्यापन अफवाह फैलाते हैं। यह अज्ञान नहीं, असंवेदनशीलता है। धर्मेंद्र का यह प्रसंग चेतावनी है। यह सिर्फ एक घटना नहीं। यह समाज की मानसिकता का आईना है। हम सत्य से दूर जा रहे हैं। हम संवेदना से रिक्त हो रहे हैं। सूचना तेज़ है, पर सत्य धीमा। यही विरोधाभास हमारी त्रासदी है।

पत्रकारिता को लौटना होगा। वहां, जहां कलम थी श्रद्धा। जहां शब्द थे शुद्ध और सटीक। जहां खबर का अर्थ था सेवा। ‘सबसे पहले’ नहीं, ‘सबसे सही’ जरूरी है। पत्रकार को फिर से सजग होना होगा। खबरों में मनुष्यता लौटानी होगी। और समाज को भी ठहरना होगा। हर पोस्ट से पहले सोचना होगा। हर प्रतिक्रिया से पहले जांचना होगा। क्योंकि झूठ की रफ्तार तेज़ है, पर सच्चाई की सांस गहरी। संवेदना ही सच्ची श्रद्धांजलि है। सत्य ही सबसे बड़ी खबर है।

धर्मेंद्र स्वस्थ हैं, पत्रकारिता बीमार। विश्वास टूटा है बुरी तरह। मीडिया के गिरेबां में झांकना जरूरी है। आत्ममंथन ही अब उपाय है। अन्यथा कल फिर कोई ‘मौत’ हमारी इंसानियत मार देगी। और तब शायद कोई न कह सकेगा, ‘अखबार में लिखा है, तो सच ही होगा।’
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं



