



गोपाल झा
पत्रकारिता कभी सत्ता की परछाईं नहीं रही, वह हमेशा उसका आइना रही है। आइना सच दिखाता है, और सच अक्सर चुभता है। शायद इसी चुभन से घबराकर आज सत्ता ‘आइना’ तोड़ने पर आमादा है। जयपुर में पत्रकार शहीद स्मारक पर सप्ताह भर से धरने पर बैठे हैं। धरना इसी टूटे हुए आईने का मूक प्रतिरोध है। जैसलमेर में एक पत्रकार के व्यावसायिक प्रतिष्ठान पर चला बुल्डोज़र केवल ईंट-पत्थर नहीं गिराता, वह इस मुल्क के लोकतांत्रिक ज़मीर पर वार करता है। आरोप है कि भ्रष्टाचार उजागर करने की सज़ा दी गई और वह भी सत्ता के इशारे पर। यह आरोप जितना गंभीर है, उतना ही डरावना भी।
यह दृश्य अकेला नहीं है। दिल्ली में भी लोकतंत्र के प्रहरी बेचैन हैं। डिजिटल मीडिया से 1.1 लाख से अधिक सामग्री हटाने की रणनीति और 73 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर वाले यूट्यूब चौनल 4पीएम के पेज को ब्लॉक करने का आदेश, यह सब मिलकर ‘अघोषित सेंसरशिप’ की कहानी कहते हैं। पिछले साल जब चैनल बंद हुआ, तब संपादक संजय शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और सरकार ने चुपचाप कदम पीछे खींच लिए। सवाल फिर वही, अगर सब कुछ कानून के दायरे में है, तो यह ख़ामोशी क्यों?

आलोचना से डर लोकतंत्र का लक्षण नहीं, तानाशाही की पहचान है। फिर यह भय क्यों? क्यों वे पत्रकार निशाने पर हैं जो सत्ता को मुस्कान नहीं, सच दिखाते हैं? आइना तोड़ने से चेहरा सुंदर नहीं होता; बदसूरती को संवारने का साहस चाहिए। मगर साहस सवालों से आता है, और सवालों से ही तो डर लगता है।
विडंबना देखिए। पिछले महीने राजकीय नेहरू मेमोरियल पीजी कॉलेज में ‘आपातकाल के 50 वर्ष’ पर भाषण प्रतियोगिता हुई। मंच से प्रेस स्वतंत्रता के हनन पर जोरदार बातें हुईं; इंदिरा गांधी को ‘घोषित आपातकाल’ की ‘खलनायिका’ ठहराया गया। इतिहास का हिसाब जरूरी है, पर वर्तमान का क्या? अगर प्रेस की आज़ादी की बात करें तो आपातकाल को लेकर आज औपचारिक घोषणा भर शेष है; व्यवहार में बहुत कुछ पहले ही सिमट चुका है। घोषित और अघोषित के फर्क में लोकतंत्र दम तोड़ देता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेस कॉन्फ़्रेंस से दूरी अब आदत बन चुकी है। नीतिगत सवालों से असहजता लोकतांत्रिक परंपरा को खोखला करती है। जो दिन-रात सत्ता का गुणगान करते हैं, उन्हें ‘असली पत्रकार’ और ‘राष्ट्रवादी’ का तमगा मिल जाता है; और जो सवाल उठाते हैं, वे कांग्रेसी, वामपंथी कहलाते हैं, संदेह के घेरे में आ जाते हैं। यह कैसा लोकतंत्र है, जहाँ सवाल पूछना देशद्रोह और ताली बजाना राष्ट्रभक्ति ठहर जाए?

कार्टूनिस्ट की जेल यात्रा इस भय की पराकाष्ठा है। कार्टून व्यंग्य की विधा है, हँसते-हँसते सच कहने का हुनर। उससे डरना अपनी नाज़ुकता का ऐलान है। सशक्त सत्ता व्यंग्य से नहीं घबराती; वह उसे सुनकर खुद को दुरुस्त करती है।
इंडियन फेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स के प्रदेशाध्यक्ष उपेंद्र सिंह राठौड़ का कहना इस दौर की हक़ीक़त बयान करता है, ‘अब सीधे टकराव के बजाय घेराबंदी होती है। विज्ञापनों पर रोक, कानूनी नोटिस, और ‘इकोनॉमिक एनकाउंटर’, कलम को थकाने की यह साजिशें पत्रकारिता को कमजोर करती हैं। इस भयावह समय में सच लिखना कठिन है, पर आवश्यक भी।’
और यहाँ जनता की भूमिका सबसे अहम है। पत्रकारिता यदि बुझी, तो अँधेरा जनता पर उतरेगा। नेताओं और दलों के प्रति अंधे मोह से बाहर आकर सच को सच कहने का साहस ही लोकतंत्र की ढाल है। सिर्फ पत्रकारों को कोसने से जिम्मेदारी पूरी नहीं होती; संरक्षण चाहिए और यह संरक्षण जनता ही दे सकती है।
आने वाला समय भारतीय लोकतंत्र के लिए कठिन, दुष्कर और परीक्षा-भरा है। अगर हम चाहते हैं कि यह गणतंत्र जीवित रहे, तो आइनों को बचाना होगा। क्योंकि जब आइने टूटते हैं, चेहरे नहीं सँवरते, सिर्फ अँधेरा गहराता है।





