



गोपाल झा.
वह कितना हैवान होगा, जिसने मासूम पोती जैसी बच्ची को हवस का शिकार बनाया, उसकी नन्हीं सांसें छीन लीं और फिर उसकी लाश संदूक में ठूंस दी। हत्या के बाद भी वह इतना शातिर बना रहा कि परिजनों को ढांढस बंधाता रहा, ‘बेटी मिल जाएगी।’ यह दरिंदगी नहीं, हैवानियत है। यह घटना सिर्फ एक बच्ची की हत्या नहीं, बल्कि पूरे समाज की अंतरात्मा की हत्या है।
हनुमानगढ़ टाउन की इस त्रासदी ने सबको हिला दिया है। सवाल यह है कि जब बेटियां अपने ही घर में सुरक्षित नहीं रहीं तो फिर सुरक्षित ठिकाना आखिर कहां है? आज यह कटु सत्य हम सबके सामने खड़ा है कि रिश्तों की पवित्रता का अर्थ खो रहा है। जो घर कभी आश्रय स्थल होते थे, वहीं असुरक्षा का गढ़ बनते जा रहे हैं।

इस हादसे का एक पहलू नशे की भयावहता भी है। बताया गया कि आरोपी नशे का आदी है और आपराधिक प्रवृत्ति का भी। नशा इंसान को धीरे-धीरे अंधेरे में धकेलता है। वह विवेक खो देता है, सही-गलत का भेद मिट जाता है। यही कारण है कि नशे में डूबा इंसान पैशाचिक प्रवृत्ति का शिकार हो जाता है। यही वजह है कि पीढ़ियों से बुजुर्ग कहते आए हैं, नशे से दूर रहो। पर सुनता कौन है? शराब, ड्रग्स और नशे का कारोबार फैलता गया और उसके साथ ही समाज में अपराध भी।

लेकिन केवल नशा ही कारण नहीं है। असल समस्या और गहरी है। रिश्तों और पारिवारिक मूल्यों का विघटन। रिश्ते अब सुविधा और स्वार्थ के बोझ तले दबने लगे हैं। कभी परिवार संस्कारों का मंदिर हुआ करता था, जहां अनुशासन, मर्यादा और अपनापन की परंपरा जीवित थी। अब वही मंदिर दरकने लगे हैं। पहले टीवी संस्कृति ने पारिवारिक संवाद पर चोट की, अब मोबाइल और सोशल मीडिया ने ‘रील’ जिंदगी को ‘रियल’ पर हावी कर दिया है। बच्चे और बड़े, सब आभासी दुनिया में उलझ गए हैं। परिणाम यह है कि संवेदनाओं का ताना-बाना टूटने लगा है और रिश्तों की अहमियत मिटने लगी है।

सोचिए, जब रिश्तों का ही मूल्य समाप्त हो जाएगा तो इंसान कैसे इंसान बना रहेगा? पिता-पुत्री, दादा-पोती, चाचा-भतीजी हर रिश्ता अपनी मर्यादा, गरिमा और सीमा के कारण पवित्र है। इन्हें तोड़कर मनुष्य खुद को दरिंदे में बदल देता है। ऐसे हादसे हमें चेतावनी देते हैं कि अगर हमने रिश्तों की मर्यादाओं की रक्षा नहीं की तो समाज अंधकार में डूब जाएगा।

हर दिन खबरें आती हैं कि किसी ने बहन को मौत के घाट उतार दिया, किसी ने पत्नी पर अत्याचार किया, किसी ने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी। किसी ने मां-बाप को मौत की घाट उतार दिया। यह सिलसिला कहीं रुकता नहीं दिख रहा। सवाल यह है कि आखिर यह किस ओर का सफर है? क्या यही हमारी आधुनिकता है? क्या यही प्रगति का दावा है?

आज समाज को ठहरकर सोचना होगा। सिर्फ कानून बनाने या सख्त सजा देने से यह समस्या हल नहीं होगी। हर अपराध के लिए पुलिस पर ठिकरा फोड़ना भी ठीक नहीं। कहते हैं, समस्या है तो समाधान भी है। इसका भी समाधान है, मूल्यों की ओर लौटना। बच्चों को बचपन से रिश्तों की अहमियत, मर्यादाओं की गरिमा और नैतिकता की शिक्षा देना होगी। परिवार को फिर से संस्कारों की पाठशाला बनाना होगा। वरना, आने वाली पीढ़ी के पास सिर्फ तकनीक होगी, पर संवेदनाएं नहीं; साधन होंगे, पर संबंध नहीं। इसी संदर्भ में श्रीगंगानगर के लोकप्रिय शायर जयकुमार ‘बेकस’ की पंक्ति आज और भी सजीव प्रतीत होती है। बकौल शायर,
कैसे रिश्ते निभाएं, जमाने के हम,
सारा माहौल ही बदचलन हो गया।
यह पंक्ति अब हमारे समय का आईना है। माहौल सचमुच बिगड़ चुका है। रिश्तों की आत्मा मर रही है और इंसान धीरे-धीरे हैवान में बदलता जा रहा है। अगर हम चाहते हैं कि फिर से परिवार सुरक्षा का आश्रय बने, बेटियां और मासूम बच्चे घर के भीतर और बाहर बेफिक्र होकर सांस ले सकें, तो हमें आत्ममंथन करना होगा। नशे के खिलाफ सामूहिक लड़ाई छेड़नी होगी। मोबाइल और आभासी संस्कृति के बीच वास्तविक जीवन के संवाद को पुनर्जीवित करना होगा। रिश्तों की गरिमा और मर्यादा को फिर से समाज के केंद्र में लाना होगा। वरना वह दिन दूर नहीं जब यह प्रश्न और भी कड़वा होकर हमारे सामने खड़ा होगा, जब घर ही असुरक्षित है, तो सुरक्षित ठिकाना आखिर कहां होगा?
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं

