




डॉ. एमपी शर्मा.
अंधेरी आधी रात, मथुरा की कोठरी में जंजीरों की खनक, बाहर सैनिकों के तलवारों पर पड़ती मशाल की लौ, और भीतर डर से काँपते वसुदेव-देवकी। देवकी की गोद में अभी-अभी जन्मा नन्हा श्यामसुंदर, चेहरे पर अलौकिक मुस्कान, मानो कह रहे हों, ‘माँ, मत डरना, मैं आ गया हूँ।’ पर यह मिलन चंद पलों का ही था। जन्मते ही वसुदेव ने आँसुओं से भीगी आँखों से बेटे को सीने से लगाया और यमुना पार की ओर चल पड़े। यमुना का उफनता जल भी शांत हो गया, मानो नन्हे कान्हा के चरण छूने को आतुर हो।

कहते हैं भगवान का जीवन सुखमय होता है, पर कृष्ण का जीवन तो जन्म से अंत तक एक कठिन परीक्षा ही था। गोकुल की गलियों में खेलते-खेलते भी कान्हा के सामने मौत कई बार आई। पूतना का विष, तृणावर्त का हमला, और कालिया नाग का आतंक। बचपन में ही कालिया दहन कर गाँव को भय से मुक्त किया। पर बचपन का यह नायक भी अपने असली घर मथुरा में नहीं, बल्कि गोपियों और ग्वाल-बालों के बीच पल रहा था, एक छुपा हुआ राजकुमार। बचपन से ही जिसकी जान के पीछे था मामा कंस, उसी का वध कर कान्हा ने मथुरा को आतंक से मुक्त किया। पर यहाँ भी सुख नहीं मिला। मथुरा छोड़नी पड़ी, और द्वारका में नया जीवन शुरू करना पड़ा।

द्वारकाधीश बनने से पहले, एक समय ऐसा भी आया जब काले मुँह वाले युद्ध को रोकने के लिए कृष्ण को मैदान छोड़ना पड़ा। रण से हटने पर लोग ‘रणछोड़’ कहने लगे, पर यह पीछे हटना कायरता नहीं, बल्कि अपनी प्रजा को बचाने की योजना थी।
कृष्ण ने पांडवों को विजय दिलाई, पर इसके बदले गांधारी का श्राप मिला, ‘तुम्हारा यदुवंश नष्ट हो जाएगा।’ महाभारत के युद्ध में कौरवों की कुटिलता का जवाब कुटिलता से दिलवाने का आरोप भी उनके सिर आया। विजय के बाद भी उनके हिस्से में केवल लांछन, श्राप और अपमान आया।

राजा होते हुए भी कभी दुर्याेधन के दरबार में, तो कभी शकुनि के व्यंग्य में, और कभी शिशुपाल के अपमान में, कृष्ण ने ताने और कटाक्ष झेले। पर उन्होंने मुस्कुराकर सहा, क्योंकि उनका ध्येय केवल धर्म की रक्षा था, स्वयं की महिमा नहीं।
श्राप सच हुआ, यदुवंश आपसी कलह में समाप्त हो गया। कृष्ण एक पीपल के पेड़ के नीचे अकेले बैठे थे, जब एक शिकारी ने उन्हें हिरण समझकर बाण मार दिया। धरा पर उनकी लीला-समाप्ति भी उतनी ही साधारण थी, जितना किसी साधारण मानव का अंत।

कृष्ण का जीवन हमें सिखाता है कि ईश्वर भी जब मानव रूप में आते हैं, तो संघर्ष, लांछन, अपमान, और कठिनाइयों से अछूते नहीं रहते। महानता इस बात में नहीं कि आपके जीवन में दुख न हो, बल्कि इसमें है कि आप हर कठिनाई में भी मुस्कुरा कर सही काम करते रहें। गीता में योगेश्वर कहते हैं, ‘सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय को समान भाव से लेकर कर्तव्य के मार्ग पर चलो, तब पाप तुमसे दूर रहेगा।’
-लेखक सामाजिक चिंतक, सीनियर सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं


