




भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
राजस्थान की सियासत में मंत्रिमंडल विस्तार की सरगर्मी चरम पर है। 20 माह से स्थिर बैठा मंत्रिमंडल अब जल्द ही नए चेहरों से सज सकता है। वहीं, कुछ मंत्रियों की छुट्टी भी हो सकती है। सूत्रों के अनुसार भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने हरी झंडी दे दी है और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की लगातार दिल्ली यात्राओं ने इन अटकलों को और बल दिया है। माना जा रहा है कि छह नए मंत्रियों को शामिल कर सरकार न केवल संगठनात्मक समीकरण साधेगी बल्कि गुटबाजी की धार को भी कुंद करने की कोशिश करेगी।

भाजपा सरकार को बने लगभग 20 महीने हो चुके हैं। वर्तमान में मुख्यमंत्री समेत कुल 24 मंत्री हैं, जबकि संविधान के अनुसार 200 सीटों वाली विधानसभा में 15 प्रतिशत यानी अधिकतम 30 मंत्री बनाए जा सकते हैं। यानी छह सीटें खाली हैं और इन्हीं पर नए चेहरों की एंट्री की तैयारी है। चर्चा है कि उपराष्ट्रपति चुनाव और मानसून सत्र से पहले इस विस्तार पर अंतिम मुहर लग सकती है।

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा पिछले 24 दिनों में तीन बार दिल्ली का दौरा कर चुके हैं। वहां उनकी भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष समेत शीर्ष नेताओं से लंबी बैठकों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल और तेज कर दी है। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात ने भी संकेत साफ कर दिए हैं कि विस्तार में सभी गुटों को बराबरी से प्रतिनिधित्व मिलेगा।

सूत्रों का कहना है कि मंत्रिमंडल विस्तार केवल नए चेहरों को जोड़ने तक सीमित नहीं होगा। मौजूदा मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा के आधार पर कुछ की छुट्टी भी हो सकती है। हाल ही में प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ ने इशारा किया था कि कुछ मंत्रियों को संगठन में जिम्मेदारी दी जा सकती है। यानी मंत्रिमंडल में नए और पुराने चेहरों के बीच फेरबदल तय है।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने हाल ही में तीन नए विधायकों को मंत्री बनाकर अपना मंत्रिमंडल 15 प्रतिशत कोटे तक पहुंचाया। वहां किसी मौजूदा मंत्री को हटाया नहीं गया। राजस्थान में भी इसी फार्मूले को अपनाए जाने की संभावना है। भाजपा नेतृत्व उन विधायकों को मौका दे सकता है जिन्हें अब तक मंत्री बनने का अवसर नहीं मिला है। इसमें पहली बार और दूसरी बार के विधायक प्रमुख दावेदार माने जा रहे हैं। पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन साधने की है। सूत्रों का कहना है कि नए मंत्रियों के चयन में यह पहलू सबसे महत्वपूर्ण होगा। राजस्थान के हर इलाके और हर वर्ग को प्रतिनिधित्व देकर भाजपा संतुलन की राजनीति साधना चाहती है। साथ ही संगठन में लंबे समय से काम कर रहे और मजबूत जनाधार वाले नेताओं को प्राथमिकता दी जा सकती है।

भाजपा युवा और अनुभवी नेताओं का मिश्रण पेश करना चाहती है। नई ऊर्जा के लिए युवाओं को तरजीह और स्थिरता के लिए अनुभवी चेहरों का सहाराकृइसी फार्मूले पर मंत्रिमंडल विस्तार की पटकथा लिखी जा रही है। पिछले कुछ महीनों में हुई राजनीतिक नियुक्तियों ने भी संकेत साफ कर दिए हैं कि भाजपा संतुलन साधने की नीति पर चल रही है। संघ के करीबी पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी को राज्य वित्त आयोग का चेयरमैन बनाया गया, तो वसुंधरा खेमे के वरिष्ठ नेता अशोक परनामी को तिरंगा यात्रा और विभाजन विभीषिका अभियान का संयोजक नियुक्त किया गया। यही संतुलन अब मंत्रिमंडल विस्तार में भी दिख सकता है।

राजस्थान भाजपा लंबे समय से गुटबाजी की चुनौती से जूझ रही है। केंद्रीय नेतृत्व चाहता है कि इस विस्तार के जरिए सभी गुटों को साथ लाकर सरकार को मजबूत संदेश दिया जाए। पार्टी का मकसद साफ हैकृआगामी चुनाव से पहले संगठन और सरकार के बीच पूर्ण तालमेल स्थापित करना और जनता के बीच सकारात्मक छवि बनाना। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि मुख्यमंत्री का एक और दिल्ली दौरा संभव है। इसमें मंत्रिमंडल में शामिल होने वाले नामों पर अंतिम चर्चा होगी। इसके बाद शीर्ष नेतृत्व से मंजूरी मिलते ही विस्तार की घोषणा कर दी जाएगी। अब सबकी नजर इस बात पर है कि कौन से नए चेहरे मंत्रिमंडल में जगह बनाएंगे और किन मौजूदा मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। इतना तय है कि यह विस्तार भाजपा सरकार के लिए न सिर्फ राजनीतिक समीकरण साधने का मौका है, बल्कि आगामी चुनावी राह आसान करने की रणनीतिक चाल भी साबित होगा।


