


भटनेर पोस्ट पॉलिटिकल डेस्क.
राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर सियासी तापमान बढ़ने लगा है। भजनलाल शर्मा सरकार को डेढ़ साल से अधिक का समय हो चुका है, लेकिन न तो मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ है और न ही संगठनात्मक ढांचे में कोई ठोस बदलाव देखने को मिला है। अब मुख्यमंत्री का दिल्ली दौरा और केंद्रीय नेतृत्व से मुलाकातों की श्रृंखला इस दिशा में नई राजनीतिक हलचल की ओर इशारा कर रही है। राज्य में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर लंबे समय से चर्चा चल रही है, लेकिन अब यह चर्चा अंतिम रूप लेने की ओर बढ़ रही है। माना जा रहा है कि विस्तार में क्षेत्रीय संतुलन, जातिगत समीकरण और भाजपा के विभिन्न गुटों को संतुलित करने की कोशिश होगी। इसमें राजपूत, ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, अनुसूचित जाति-जनजाति और ओबीसी समुदायों के प्रतिनिधित्व का विशेष ध्यान रखा जाएगा। सीएम भजनलाल शर्मा के समक्ष चुनौती यह है कि वे अपने कोर टीम को मजबूती दें, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करें कि पार्टी में समरसता बनी रहे और कोई गुट असंतुष्ट न हो। यह काम आसान नहीं होगा, लेकिन यदि केंद्रीय नेतृत्व के मार्गदर्शन में संतुलन साधा गया, तो भाजपा को आगामी चुनावों में इसका लाभ मिल सकता है।

राजस्थान में भाजपा की राजनीति एक बार फिर नए मोड़ पर है। लंबे समय से प्रतीक्षित मंत्रिमंडल विस्तार और संगठनात्मक पुनर्गठन अब केवल कयास नहीं, बल्कि ठोस राजनीतिक संकेत बन चुके हैं। वसुंधरा राजे की सक्रियता, भजनलाल शर्मा की दिल्ली में केंद्रीय नेतृत्व से मुलाकातें, और हाशिए पर चल रहे नेताओं की पुनः सक्रियता इस ओर संकेत करती हैं कि भाजपा अब 2028 के विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव की रणनीति के तहत सभी गुटों को साधकर मजबूत जमीन तैयार करने में जुट गई है। आने वाले दिनों में राजस्थान भाजपा की नई सियासी बिसात पूरी स्पष्टता के साथ सामने आ सकती है।

दरअसल, पूरे घटनाक्रम की शुरुआत 28 जुलाई से मानी जा रही है, जब पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। यह मुलाकात केवल एक शिष्टाचार भेंट नहीं, बल्कि अपने गुट के नेताओं को सत्ता और संगठन में उचित प्रतिनिधित्व दिलाने की रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। इसके ठीक अगले दिन मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की भी प्रधानमंत्री से भेंट होती है, जिससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि पार्टी के भीतर अंदरखाने कुछ महत्वपूर्ण चर्चाएं चल रही हैं। वसुंधरा राजे की सक्रियता के बाद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का अचानक बांसवाड़ा से दिल्ली जाना, वहां देर रात केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात करना, और फिर अगले दिन संगठन महामंत्री बीएल संतोष से भेंट, इन सभी घटनाओं ने प्रदेश में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार और संगठन पुनर्गठन की अटकलों को बल दिया है। यह माना जा रहा है कि इन बैठकों में प्रदेश की जातिगत, क्षेत्रीय और गुटीय संतुलन पर आधारित राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर मंथन हुआ है।

भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अब स्पष्ट तौर पर यह चाहता है कि राजस्थान में सभी गुटों को संतुलित रूप से साधा जाए। यह केवल सत्ता का प्रश्न नहीं है, बल्कि 2029 की तैयारी, लोकसभा चुनावों और संगठनात्मक मजबूती से भी जुड़ा है। पार्टी यह मान रही है कि लंबे समय से हाशिए पर चल रहे नेताओं को यदि उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला, तो असंतोष पार्टी के आंतरिक ढांचे को नुकसान पहुंचा सकता है।
भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ को नियुक्त हुए एक साल से अधिक समय हो चुका है, लेकिन अब तक उन्होंने अपनी नई कार्यकारिणी की घोषणा नहीं की है। वे पुरानी टीम के साथ ही संगठन चला रहे हैं। अब जब मंत्रिमंडल विस्तार की बात जोर पकड़ रही है, तो संगठनात्मक पुनर्गठन की भी संभावना प्रबल हो गई है। राठौड़ को भी पार्टी के विभिन्न गुटों को साथ लेकर चलना होगा, खासकर वसुंधरा समर्थक नेताओं को भी पुनः सक्रिय भूमिका में लाने का दबाव उन पर रहेगा।

संगठन में समावेशी रणनीति के संकेत उस वक्त मिले, जब विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर आयोजित होने वाली तिरंगा यात्रा के संयोजक के रूप में पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी को नियुक्त किया गया। परनामी वसुंधरा राजे गुट के नेता माने जाते हैं और लंबे समय से हाशिए पर थे। उनकी नियुक्ति एक स्पष्ट संकेत है कि पार्टी अब पुराने विरोधों को भुलाकर सभी को साथ लेकर चलना चाहती है। इसी तरह पूर्व प्रदेशाध्यक्ष और वरिष्ठ नेता अरुण चतुर्वेदी को राज्य वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद से ही राजनीतिक नियुक्तियों की शुरुआत मानी जा रही है। यह नियुक्ति न केवल चतुर्वेदी की प्रशासनिक क्षमताओं को मान्यता देती है, बल्कि उन पुराने नेताओं को पुनः मुख्यधारा में लाने की भी शुरुआत मानी जा सकती है, जिन्होंने पार्टी को जमीनी स्तर पर खड़ा किया।



