






भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
राजस्थान की राजनीति में इन दिनों सबसे चर्चित सवाल यह है कि आखिर विधानसभा सत्र से पहले मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने अचानक सांसदों, विधायकों और पार्टी प्रत्याशियों के साथ 25-26 अगस्त को दो-दिवसीय संवाद कार्यक्रम क्यों तय किया है? सतही तौर पर यह पार्टी का रूटीन फीडबैक सेशन लग सकता है, लेकिन सियासी हलकों में इसे विधायकों की बढ़ती नाराज़गी को शांत करने और आगामी मंत्रिमंडल विस्तार से पहले माहौल बनाने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है।

प्रदेश में बीजेपी सरकार बने अभी पौने दो साल भी नहीं हुए हैं, लेकिन विधायकों की असंतुष्टि समय-समय पर खुलकर सामने आती रही है। कई विधायक सार्वजनिक मंचों पर यह तक कह चुके हैं कि सरकार में उनकी सुनवाई नहीं होती। सबसे ताज़ा उदाहरण लालसोट से बीजेपी विधायक रामबिलास मीणा का है, जिन्होंने अपने ही मंत्री यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा की कार्यशैली पर सवाल उठाए और कहा कि वे शिकायत सीधे मुख्यमंत्री से करेंगे।

पिछले साल भी सीएम भजनलाल शर्मा के संवाद कार्यक्रम में विधायकों ने खुले मंच पर मंत्रियों और अधिकारियों के रवैये को लेकर नाराज़गी जताई थी। कईयों ने तो मंत्रियों द्वारा फोन तक न उठाने और कार्यों की अनदेखी की शिकायत की थी। इस बार विधानसभा सत्र नजदीक है, ऐसे में पार्टी आलाकमान नहीं चाहता कि सत्र के दौरान असंतुष्ट विधायक अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा करें।

सूत्र बताते हैं कि सीएम भजनलाल शर्मा ने इस संवाद कार्यक्रम को बेहद व्यवस्थित तरीके से प्लान किया है। 25 अगस्त को कोटा लोकसभा से शुरुआत होगी। सुबह के सत्र में कोटा, झालावाड़, टोंक-सवाईमाधोपुर, भरतपुर और करौली-धौलपुर क्षेत्र के सांसद, विधायक और प्रत्याशी सीएमआर (मुख्यमंत्री निवास) पहुंचेंगे। शाम को उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, बांसवाड़ा और भीलवाड़ा क्षेत्र की बारी होगी। 26 अगस्त को शेष लोकसभाओं के प्रतिनिधियों से संवाद होगा।

इस दौरान न केवल सांसद-विधायक बल्कि जिलाध्यक्षों को भी बुलाया गया है। जिलाध्यक्ष अपने क्षेत्र में विधायकों की सक्रियता और पार्टी कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी की रिपोर्ट सीधे मुख्यमंत्री और प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के सामने रखेंगे।
संवाद कार्यक्रम को कैबिनेट विस्तार से भी जोड़ा जा रहा है। केंद्रीय नेतृत्व साफ कर चुका है कि संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय और जनता से सीधा जुड़ाव रखने वाले विधायकों को मंत्री पद में प्राथमिकता मिलेगी। ऐसे में जिलाध्यक्षों की रिपोर्ट विधायकों के लिए ‘मार्कशीट’ साबित हो सकती है। यानी जो विधायक क्षेत्र और संगठन में सक्रिय रहेंगे, उन्हें सीएम और हाईकमान तरजीह देंगे।

बीजेपी नेतृत्व समझता है कि राजस्थान जैसे बड़े राज्य में सरकार और संगठन का संतुलन बेहद जरूरी है। पिछले एक साल में कई बार संगठन और सरकार के बीच तालमेल को लेकर असंतोष उभरा है। विधायकों की यह शिकायत रही है कि मंत्री और अधिकारी उनकी अनदेखी करते हैं, वहीं संगठन का मानना है कि कई विधायक जनता और पार्टी कार्यक्रमों से दूरी बनाए रखते हैं। ऐसे में सीएम का यह संवाद अभियान दोनों पक्षों के बीच पुल का काम कर सकता है।

यह कदम केवल आंतरिक असंतोष को शांत करने तक सीमित नहीं है। विधानसभा सत्र से पहले कांग्रेस विपक्ष में बैठकर सरकार को घेरने की पूरी तैयारी में है। महंगाई, बेरोजगारी, किसानों के मुद्दे और लोकल असंतोष को लेकर विपक्ष सदन में आक्रामक रहेगा। ऐसे में सीएम भजनलाल शर्मा चाहते हैं कि भाजपा विधायक एकजुट रहकर विपक्ष के हमलों का सामना करें, न कि असंतोष जाहिर करके सरकार को ही असहज स्थिति में डाल दें।

पार्टी के अंदरूनी हलकों का कहना है कि संवाद सेशन में मुख्यमंत्री का मुख्य फोकस विधायकों की शिकायतें सुनना, उन्हें आश्वस्त करना और संगठन के प्रति उनकी जवाबदेही तय करना होगा। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या केवल संवाद से विधायकों की नाराज़गी दूर हो जाएगी? या फिर मंत्रिमंडल विस्तार और संगठनात्मक नियुक्तियों में उन्हें हिस्सेदारी देने से ही माहौल बदलेगा?
इस कार्यक्रम के कई राजनीतिक संदेश हैं। विधायकों को भरोसा दिलाना कि सरकार और संगठन दोनों उनकी सुनवाई के लिए तत्पर हैं। जो विधायक जनता और पार्टी से दूरी बनाएंगे, उन्हें भविष्य में जिम्मेदारी नहीं मिलेगी। बीजेपी आंतरिक असंतोष को भुनाने का मौका कांग्रेस को नहीं देना चाहती। कार्यकर्ताओं और विधायकों को यह समझाना कि भविष्य में मंत्री पद केवल उन्हीं को मिलेगा, जो जमीन पर सक्रिय रहेंगे।

वरिष्ठ पत्रकार विमल चौहान ‘भटनेर पोस्ट’ से कहते हैं, ‘विधानसभा सत्र से ठीक पहले सीएम भजनलाल शर्मा का यह संवाद अभियान राजस्थान की राजनीति में केवल ‘फीडबैक मीटिंग’ नहीं है। यह एक राजनीतिक रणनीति है, जहाँ सरकार अपने ही विधायकों को साधने, संगठन को मजबूत करने और मंत्रिमंडल विस्तार से पहले माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। अब देखना यह है कि नाराज़ विधायकों का गुस्सा इस संवाद से ठंडा होता है या सत्र के दौरान फिर से सरकार को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।’

