






भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
राजस्थान में पंचायत चुनाव को लेकर सरकार और चुनाव आयोग के बीच खींचतान गहराती जा रही है। 25 अगस्त को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने बड़ा निर्णय देते हुए एकलपीठ के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें सरकार को जल्द पंचायत चुनाव कराने और प्रशासकों को हटाने के निर्देश दिए गए थे। दरअसल, 18 अगस्त को हाईकोर्ट की एकलपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि पंचायत चुनाव शीघ्र कराए जाएँ। साथ ही, जिन सरपंचों को प्रशासक नियुक्त किया गया है, उन्हें तत्काल पदमुक्त किया जाए। इस आदेश को राज्य सरकार ने चुनौती दी और डिवीजन बेंच में अपील दायर की। जस्टिस एस.पी. शर्मा की खंडपीठ ने सरकार की दलीलों को सुनने के बाद एकलपीठ के आदेश पर रोक लगा दी।

सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद ने कहा कि पंचायत चुनाव को लेकर पहले से ही हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में सुनवाई पूरी हो चुकी है और फैसला सुरक्षित रखा गया है। ऐसे में एकलपीठ का इस मामले में हस्तक्षेप करना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासकों को अस्थाई तौर पर नियुक्त किया गया है ताकि पंचायतों का दैनिक कामकाज बाधित न हो। प्रशासक पद पर बने सरपंच चुनाव होने पर स्वतः ही हट जाएंगे, इसलिए उन्हें विधिक क्षति नहीं हुई है।

हाईकोर्ट की एकलपीठ के आदेश के बाद राज्य चुनाव आयोग ने तुरंत पंचायत चुनाव कराने की घोषणा कर दी थी। इसके विपरीत, राज्य सरकार का रुख है कि पंचायतों और निकायों के चुनाव वन स्टेट वन इलेक्शन की तर्ज पर एक साथ कराए जाएँ। सरकार का तर्क है कि नए जिलों के गठन और परिसीमन की प्रक्रिया में समय लगा है, जिससे वार्डों के पुनर्गठन का काम पूरा होने के बाद ही निष्पक्ष चुनाव संभव हो पाएँगे। यही वजह रही कि सरकार और चुनाव आयोग के बीच टकराव की स्थिति बन गई।

डिवीजन बेंच के ताज़ा आदेश से सरकार को फिलहाल राहत मिल गई है और चुनाव टलते नज़र आ रहे हैं। अब मामला बड़े फैसले की ओर बढ़ चुका है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय क्या दिशा देता है, क्या पंचायत चुनाव समय पर होंगे या फिर सरकार की मंशा के अनुरूप निकाय और पंचायतों के चुनाव एक साथ कराए जाएंगे।




