




भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
भटनेर किला, राजस्थान के हनुमानगढ़ में स्थित, केवल एक सामरिक दुर्ग नहीं, बल्कि योगेश्वर श्रीकृष्ण की परंपरा से जुड़ा जीवंत प्रमाण है। इतिहासकार मानते हैं कि इसका निर्माण तीसरी शताब्दी में यादववंशी भाटी राजपूतों ने किया था, जो स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के वंशज मानते थे।

भाटी राजपूतों की उत्पत्ति मथुरा से जुड़ी बताई जाती है। राव भाटी ने मथुरा से विस्थापित होने के बाद पंजाब और पश्चिमी भारत के कई क्षेत्रों पर अधिकार जमाया। यहीं से उनका साम्राज्य लाखी जंगल होते हुए भटनेर तक पहुंचा और यह किला उनकी पहचान का केंद्र बना। किले का नाम ही इसका संकेत है, ‘भटनेर’, यानी भाटियों का नगर।

इतिहास के जानकार डॉ. श्यामसुंदर शर्मा बताते हैं कि 814 ईस्वी तक राव तन्नू-जी ने पश्चिमी राजस्थान व पूर्वी चोलिस्तान में भाटियों का प्रभाव बढ़ाया और भटनेर को अभेद्य किले के रूप में विकसित किया। 12वीं शताब्दी में विजयराव लांजो ने गजनी से गुजरात तक फैले दुर्गों पर नियंत्रण स्थापित कर स्वयं को ‘परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ की उपाधि से विभूषित किया। यह उपाधि स्पष्ट करती है कि भाटी शासक स्वयं को श्रीकृष्णीय परंपरा का संवाहक मानते थे।

भटनेर किले का इतिहास लगातार संघर्षों से भरा रहा। भाटी शासकों ने क़ारमितों, ग़ज़नवी और ग़ुरी आक्रमणों को रोका। 1398 में तैमूर जब भारत आया, तो केवल भटनेर के शासक राय दुल चंद ने उसका सीधा मुकाबला किया। यद्यपि अंततः किला लूट लिया गया, लेकिन यह प्रतिरोध भाटी वीरता का प्रतीक बन गया। भटनेर से निकलकर भाटी शासकों ने पंजाब में कपूरथला, अंबाला और बटाला जैसे नगर बसाए। पुगल के भाटी शासक राव केलाना ने अबोहर और भटिंडा तक विस्तार किया। बलूचों को हराने के बाद उनका वैवाहिक गठबंधन भी हुआ, जिसने इस वंश को और सुदृढ़ किया।

भटनेर किला आज भी इस बात का साक्षी है कि हनुमानगढ़ केवल राजस्थान का सीमांत जिला नहीं, बल्कि यादववंशी परंपरा का गौरवस्थल है। भाटी राजपूतों ने यहां से वह गाथा लिखी, जिसने मथुरा और द्वारका की गूंज को थार के रेगिस्तान तक पहुंचाया।
दिवंगत साहित्यकार ओम पुरोहित ‘कागद’ के मुताबिक, भटनेर किला केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण के वंशजों की वीरता, परंपरा और अस्मिता का प्रतीक है। यह किला प्रमाणित करता है कि हनुमानगढ़ की मिट्टी में भी वही रक्त संचारित हुआ, जिसने मथुरा और द्वारका की महिमा रची थी।


