




डॉ. एमपी शर्मा.
मनुष्य का जीवन उतार-चढ़ाव से भरी हुई एक निरंतर यात्रा है। कभी परिस्थितियाँ इतनी अनुकूल होती हैं कि सफलता हमारे कदम चूम लेती है, तो कभी समय ऐसा भी आता है जब हर प्रयास असफल होता हुआ प्रतीत होता है। यही संघर्ष जीवन को जीवन बनाता है। लेकिन इस यात्रा में सबसे बड़ी चुनौती केवल बाहरी परिस्थितियाँ नहीं होतीं, बल्कि भीतर की अस्थिरता, भय और संदेह होते हैं। इन्हें दूर करने वाली सबसे सशक्त शक्ति है, ईश्वर में विश्वास।

जब हम यह मान लेते हैं कि हर कार्य किसी अदृश्य, ऊँची शक्ति की इच्छा से ही पूर्ण होता है, तब हमारी आत्मा को एक अनोखा संतोष मिलता है। यह भावना हमें यह विश्वास दिलाती है कि चाहे परिणाम हमारे अनुकूल न भी हो, फिर भी वह हमारी भलाई के लिए ही है। यही आस्था हमें टूटने से बचाती है और आत्मविश्वास को बनाए रखती है।

मानव स्वभाव का एक पहलू है, भय। जब कोई अकेला होता है और विशेषकर रात के अंधकार में सुनसान रास्ते से गुजरना पड़ता है, तो मन में अनायास ही डर की लहर दौड़ जाती है। लेकिन जैसे ही उसके साथ कोई छोटा-सा पालतू प्राणी भी जुड़ जाता है, मनोबल बढ़ने लगता है। यही सिद्धांत ईश्वर में आस्था पर भी लागू होता है। जब इंसान यह विश्वास करता है कि ‘मैं अकेला नहीं हूँ, मेरे साथ ईश्वर हैं,’ तो भय, चिंता और असुरक्षा की दीवारें ढहने लगती हैं। यह आंतरिक विश्वास हर परिस्थिति में सुरक्षा का कवच बन जाता है।

जीवन में असफलता अवश्यंभावी है। हर व्यक्ति को कभी न कभी निराशा और पराजय का सामना करना पड़ता है। ऐसे समय में कमजोर मनुष्य टूट जाता है, निराशा के अंधकार में डूब जाता है और स्वयं को व्यर्थ मानने लगता है। लेकिन आस्थावान व्यक्ति अलग होता है। वह असफलता को भी ईश्वर की इच्छा मानता है।

उसके मन में यह विचार दृढ़ होता है कि ‘आज का असफल प्रयास मेरे लिए सीख है, कल अवश्य ही बेहतर अवसर आएंगे।’ यही सोच उसे नकारात्मकता से बचाती है और भविष्य के लिए तैयार करती है। इस प्रकार आस्था केवल धर्म का अंग नहीं, बल्कि जीवन जीने की सशक्त कला है।

जब कोई नया कार्य प्रारंभ करना होता है, तो स्वाभाविक रूप से मन में शंका उठती है, ‘क्या मैं सफल हो पाऊँगा?’ यही संकोच व्यक्ति के कदम रोक देता है। लेकिन यदि हृदय में यह भावना हो कि ‘ईश्वर मेरे साथ हैं,’ तो संकोच दूर हो जाता है। आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है और कार्य के प्रति उत्साह प्रबल हो जाता है।

आस्था हमें साहस और धैर्य देती है। यह केवल बाहरी उपलब्धियों की नहीं, बल्कि आंतरिक शांति की भी जननी है। जो व्यक्ति ईश्वर की उपस्थिति में विश्वास रखता है, वह परिस्थिति कैसी भी क्यों न हो, सहज और संतुलित रहता है। अक्सर लोग समझते हैं कि ईश्वर में विश्वास का अर्थ केवल पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं गहरी है। आस्था केवल आरती, भजन या प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह मानसिक शक्ति और आत्मबल को सुदृढ़ करने वाली ऊर्जा है।

जब विश्वास दृढ़ हो जाता है, तो आत्मविश्वास स्वतः ही उमड़ पड़ता है। व्यक्ति की सोच सकारात्मक बनती है, और वह दूसरों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन जाता है। आस्थावान व्यक्ति हर परिस्थिति में धैर्य रखता है, संकट को अवसर में बदलता है और जीवन को सार्थक बनाता है। विश्वास और आत्मविश्वास एक-दूसरे के पूरक हैं। ईश्वर में आस्था हमें यह आश्वासन देती है कि हम अकेले नहीं हैं, और आत्मविश्वास हमें वह शक्ति देता है कि हम हर चुनौती का सामना कर सकें। दोनों मिलकर व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में सफलता की ओर अग्रसर करते हैं। जिसके भीतर यह संगम होता है, उसका व्यक्तित्व अलग ही आभा से दमकता है। वह हार में भी हार नहीं मानता, और जीत को भी विनम्रता से स्वीकार करता है।

ईश्वर में विश्वास मनुष्य को मानसिक शांति, साहस और धैर्य प्रदान करता है। यह केवल एक धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि एक जीवनदर्शन है, जो हमें हर परिस्थिति में संतुलित रहने की कला सिखाता है। जब इंसान यह मान लेता है कि ‘मेरा हर कदम ईश्वर की इच्छा से ही उठ रहा है,’ तो उसके भीतर का आत्मविश्वास कभी डगमगाता नहीं। आस्था हमें भय से मुक्त करती है, असफलता में संबल देती है और सफलता में विनम्र बनाए रखती है। यही कारण है कि आत्मविश्वासी और आस्थावान व्यक्ति ही जीवन की हर कठिनाई को पार कर, सच्चे अर्थों में जीवन को सार्थक बना पाता है।
-लेखक सामाजिक चिंतक, पेशे से सीनियर सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं



