



गोपाल झा.
अख़बार से मेरा रिश्ता कब बना, यह याद नहीं। जैसे कोई नदी चुपचाप ज़मीन के नीचे बहती रहती है और फिर अचानक जीवन का हिस्सा बन जाती है, कुछ वैसा ही। इतना ज़रूर याद है कि पहला अख़बार ‘आर्यावर्त’ था। तब मैं ननिहाल में रहता था, दरभंगा ज़िले का छोटा-सा गांव तुमौल। आज के हिसाब से गांव कहना आसान है, लेकिन उस दौर में गांव तक अख़बार पहुंचना कोई सामान्य बात नहीं थी। तुमौल में तो अख़बार आता ही नहीं था। मजबूरी थी कि महथौर चौक से लाया जाए। इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में मामाजी थे। श्री कृष्णानंद मिश्र। पेशे से अध्यापक। वे अख़बार के नियमित पाठक थे, तब भी और आज भी। उनकी दिनचर्या में अख़बार पढ़ना उतना ही ज़रूरी था, जितना सुबह की चाय। शायद वही दृश्य, वही आदत, मेरे भीतर कहीं बैठ गई।
‘आर्यावर्त’ के बाद बिहार में ‘आज’, ‘हिंदुस्तान’ और ‘दैनिक जागरण’ का बोलबाला रहा। फिर जीवन मुझे हनुमानगढ़ ले आया, जहां ‘राजस्थान पत्रिका’ की धूम थी। इसी बीच ‘दैनिक तेज’, ‘तेज केसरी’, ‘इबादत’, ‘सांध्य दैनिक माणिक्य’, श्रीगंगानगर से निकलने वाले ‘सीमा संदेश’, ‘प्रताप केसरी’, ‘दैनिक भोर’, ‘लोकसम्मत’, ‘प्रशांत ज्योति’, ‘सीमा किरण’ जैसे कितने ही अख़बार मेरे जीवन में आए-गए। कुछ पढ़े गए, कुछ जिए गए। ‘दैनिक भास्कर’ बाद में आया। ‘पंजाब केसरी’ को लोग घर में ले जाने में हिचकिचाहट महसूस करते थे, रंगीन पेज में छपी तस्वीरों के कारण।

अख़बार कब मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया, यह भी नहीं पता चला। लिखने का शौक था। उस दौर में ‘दैनिक तेज’ सबसे लोकप्रिय अख़बार माना जाता था। उसमें छपना बड़ी बात थी। मेरी खुशकिस्मती थी कि संपादक डॉ. तेज नारायण शर्मा जी का स्नेह मिला। वह दौर आज के युवाओं को शायद कल्पना जैसा लगे। ट्रेडल मशीन पर अख़बार छपता था। हर अक्षर जोड़कर शब्द बनते थे, शब्दों से वाक्य, और वाक्यों से खबर।

तब अख़बार में फोटो छपना आम बात नहीं थी। बड़े नेता या चुनिंदा अधिकारी ही फोटो के हकदार होते थे। ऐसे समय में जब मेरे लेख के साथ मेरा फोटो छपा, तो वह सिर्फ फोटो नहीं था, वह एक भरोसे की मुहर थी। डॉ. तेज नारायण शर्मा जी ने मेरे लिए फोटो का ब्लॉक बनवाया। बाद में ऑफसेट मशीन आई और फोटो छपना आम हो गया, लेकिन उस पहले फोटो की अहमियत आज भी मन में सुरक्षित है।

लेखन की शुरुआत यूं तो 1995 में हो गई थी, लेकिन वेतनभोगी पत्रकार के रूप में पहला काम 1996 में मिला। 1999 में मैंने ‘इंदुशेखर’ अख़बार का प्रकाशन शुरू किया। आज के डिजिटल दौर में पाक्षिक अख़बार का महत्व समझाना कठिन है, लेकिन तब लोग बेसब्री से इंतज़ार करते थे। अख़बार सिर्फ सूचना नहीं होता था, वह संवाद होता था।

तीन दशक की पत्रकारिता के बाद आज बहुत कुछ बदला हुआ महसूस होता है। तब लोग कम पढ़े-लिखे होते हुए भी गंभीर थे। वैचारिक प्रतिबद्धता थी, सामाजिक सरोकार थे, दायित्वबोध था। आज यह सब दुर्लभ होता जा रहा है। पत्रकारिता में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है जिन्हें पत्रकारिता की ए-बी-सी भी नहीं आती। न खबर की समझ, न शब्दों की मर्यादा। ऐसे लोग पत्रकारिता पर बोझ हैं, यह कहने में संकोच नहीं।

अब एआई का युग है। विडंबना यह है कि जो लोग स्थानीय खबर भी सलीके से नहीं लिख सकते, वे अंतरराष्ट्रीय राजनीति की विवेचना करने लगे हैं। यह देखकर हैरानी होती है, कभी-कभी अफसोस भी।

टीवी चैनलों का दौर आया तो लगा कि प्रिंट मीडिया का अंत तय है। असर पड़ा, इसमें शक नहीं। लेकिन समय ने एक और मोड़ लिया। लोग टीवी चैनलों से ऊब गए। शोर, सनसनी और दिखावे ने भरोसा तोड़ दिया। अब डिजिटल दौर है, मोबाइल पर सब कुछ चाहिए। अख़बार, मैगजीन, वेबसाइट, यूट्यूब, सब एक साथ।

फिर भी प्रिंट के पाठक आज भी मौजूद हैं। शायद इसलिए कि अख़बार सिर्फ खबर नहीं देता, वह भरोसा देता है। इसी सोच के साथ भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप ने पाठकों के लिए हर प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराया। आज दर्जन भर राज्यों में भटनेर पोस्ट मैगजीन के पाठक हैं। जिले भर में ‘भटनेर पोस्ट’ और ‘ग्राम सेतु’ अख़बारों का इंतज़ार रहता है। भटनेर पोस्ट डॉट कॉम और ग्राम सेतु डॉट कॉम के लाखों पाठक दुनिया भर में हैं। सीमित संसाधनों में यह भरोसा हमारे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है।

हमें पूरा यकीन है कि अख़बारों का दौर कभी खत्म नहीं होगा। जब सोशल मीडिया के शोर में सच दबने लगेगा, तब पाठक फिर अख़बार की ओर लौटेगा। क्योंकि अख़बार एक जीवंत दस्तावेज है, जिसे चुनौती दी जा सकती है, पर नकारा नहीं जा सकता।
भारतीय समाचार पत्र दिवस पर बीते दौर के ये संस्मरण यूं ही मन में उमड़ आए। वह दौर अपनी सादगी, संजीदगी और जिम्मेदारी के लिए हमेशा याद रखा जाएगा। हमने अख़बारों के कई दौर देखे हैं, उन्हें जिया है, सीखा है। और यही हमारी सबसे बड़ी पूंजी है।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं







