



आर्किटेक्ट ओम बिश्नोई
23 मार्च भारतीय और विश्व इतिहास की वह तारीख है, जिसे सवालों की आग से याद किया जाना चाहिए। आज ही के दिन यानी 23 मार्च 1931 को ब्रिटिश हुकूमत ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर चढ़ा दिया। सत्ता को लगा कि तीन देह खत्म कर देने से विचार भी मर जाएंगे। इतिहास ने बार-बार साबित किया, यह सबसे बड़ी राजनीतिक भूल होती है।
आज जब पूरी दुनिया ‘खुले बाजार’ के नारे के साथ चल रही है, तब आम आदमी, किसान, कामगार और छोटे व्यापारी के सामने समस्याओं की फेहरिस्त और लंबी हो गई है। महंगाई, बेरोजगारी, असुरक्षा और अनिश्चित भविष्य, ये सब किसी प्राकृतिक आपदा की देन नहीं, बल्कि नीतिगत फैसलों का नतीजा हैं। विडंबना यह है कि लोकतंत्र के नाम पर चल रही व्यवस्थाएं जनता के जीवन को बेहतर बनाने की जगह, मुट्ठीभर ताकतवर घरानों के हित साधने में जुटी हैं।
दुनिया आज 50-100 कॉरपोरेट घरानों के हाथों गिरवी सी नजर आती है। राजनीति, राजनेता और राजनीतिक दल उन्हीं के चंदे पर पलते हैं। लोकतांत्रिक ढांचे मौजूद हैं, चुनाव भी होते हैं, लेकिन नीतियों की दिशा वही तय करते हैं जिनके पास अथाह पूंजी है। आम जनता के सवाल रोटी, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य हाशिए पर चले गए हैं। सत्ता और पूंजी का यह गठजोड़ हर देश में अलग-अलग शक्ल में मौजूद है।
इतिहास बताता है कि जहां जागरूक नागरिक समूह मजबूत होते हैं, वहां व्यवस्थाएं भी जवाबदेह बनती हैं। अधिकार भीख में नहीं मिलते, सड़कों पर उतरकर लिए जाते हैं, यह बात भगत सिंह की पीढ़ी अच्छी तरह जानती थी। लेकिन आज नागरिकों को धर्म, जाति और संप्रदाय के ऐसे उलझाव में फंसा दिया गया है कि वे अनजाने में ही तानाशाही और साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों के लिए रास्ता साफ कर देते हैं। नफरत की राजनीति लोकतंत्र के लिए अफीम का काम करती है? दर्द भी नहीं महसूस होता और जंजीरें कसती चली जाती हैं।
आज का मुख्यधारा मीडिया भी इस सच्चाई से अछूता नहीं है। बड़े मीडिया हाउस उन्हीं पूंजीगत घरानों के स्वामित्व में हैं, जिनके हितों की रक्षा सत्ता करती है। नतीजा यह कि नागरिक अधिकार धीरे-धीरे कुंद किए जा रहे हैं और असली मुद्दों की जगह शोरगुल भरी बहसें परोसी जाती हैं, ‘धर्म खतरे में है’, ‘जाति खतरे में है’। इन नारों के पीछे असल खतरे भूख, बेरोजगारी, असमानताकृको छिपा दिया जाता है।
ऐसे समय में शहीदों के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। बेहतर, समतामूलक समाज का ताना-बाना उन्हीं सपनों से बुना जा सकता है, जिन पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने अपने प्राण न्योछावर किए। सत्ता इन शहीदों को औपचारिक श्रद्धांजलि जरूर देती है, क्योंकि वह जानती है कि जनता की स्मृति में इनकी जड़ें गहरी हैं। लेकिन पूरी कोशिश रहती है कि जनता को इन शहीदों के विचारों से दूर रखा जाए, क्योंकि विचार सवाल खड़े करते हैं, और सवाल सत्ता को असहज करते हैं।
भगत सिंह का कथन ‘दुनिया में कहीं भी मानव पीड़ित होता है तो उससे सरोकार मुझे है’ सिर्फ एक भावनात्मक पंक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक मानवीय दृष्टि का घोष है। यह राष्ट्रवाद को मानवता से जोड़ने की बात करता है, उसे संकीर्ण सीमाओं में कैद नहीं करता। अगर युवा इस कथन को उसकी गहराई में समझ लें, तो न सिर्फ बेहतर समाज की राह निकलेगी, बल्कि बेहतर राजनीति की भी नींव पड़ेगी।
जेल से लिखे अपने पत्रों में भगत सिंह साफ कहते हैं कि उन्हें जीवन से प्रेम था। वे रंगीनियों, संपन्नताओं और खुशियों के साथ जीना चाहते थे। लेकिन अगर उनके जीवन का बलिदान एक संभावित बेहतर समाज की नींव रख सकता है, तो वह सौदा उन्हें मंजूर था। यह आत्महत्या नहीं थी, यह भविष्य में इंसान को इंसान की तरह जीते देखने की जिद थी।
आज जरूरत है कि हम अपने आसपास के किसानों, कामगारों और छोटे व्यापारियों के संघर्षों में साथ खड़े हों, चाहे वह शारीरिक सहयोग हो या लेखनी का। यही शहीदों के सपनों के समाज की असली बुनियाद है। ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा फांसी का फंदा चूमते हुए लगाया गया था, उसका अर्थ साफ है, बेहतर के लिए परिवर्तन की जय।
23 मार्च यह पूछता है, क्या हम उस बदलाव के लिए तैयार हैं, जिसके लिए शहीद हंसे-हंसते मौत के गले लग गए?








