



भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
जब शादियां अक्सर करोड़ों के खर्च, दिखावे और सोशल मीडिया की चमक-दमक से पहचानी जाती हैं, ऐसे दौर में सादगी का रास्ता चुनना अपने आप में एक साहसिक और प्रेरक फैसला है। इसी सादगी की मिसाल पेश की है भारतीय प्रशासनिक सेवा के 2023 बैच के दो युवा अधिकारियों, माधव भारद्वाज और अदिति वार्ष्णेय ने, जिन्होंने बिना किसी शोर-शराबे के न्यायालय में विवाह कर समाज को एक स्पष्ट संदेश दिया है।

राजस्थान के अलवर में उपखंड अधिकारी के पद पर कार्यरत माधव भारद्वाज और गुजरात के जामनगर में उपखंड अधिकारी के रूप में सेवाएं दे रहीं अदिति वार्ष्णेय को जीवन के नए अध्याय में बंध गए। यह विवाह न किसी आलीशान होटल में हुआ, न ही इसमें वीआईपी मेहमानों की लंबी सूची थी। अलवर के मिनी सचिवालय में, जिला कलेक्टर अर्पिता शुक्ला की उपस्थिति में, दोनों ने अत्यंत सादगी से अपना विवाह पंजीकृत कराया।

इस अवसर पर माहौल बिल्कुल अलग था। न ढोल-नगाड़े, न बैंड-बाजा और न ही दिखावे की कोई रस्म। केवल दोनों परिवारों के माता-पिता और भाई-बहन मौजूद थे। उन्हीं सीमित पर आत्मीय लोगों के बीच वर-वधू ने एक-दूसरे को माला पहनाकर विवाह की औपचारिकताएं पूरी कीं। सचमुच, खुशी का रिश्ता शोर से नहीं, समझ और सहमति से बनता है।

माधव भारद्वाज मूल रूप से मसूरी के निवासी हैं। उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा 2022 में अखिल भारतीय स्तर पर 536वां स्थान प्राप्त किया था। इससे पहले वे भारतीय प्रबंध संस्थान, अहमदाबाद से प्रबंधन में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर चुके हैं। माधव गतिशील शारीरिक दिव्यांगता की श्रेणी में आते हैं, लेकिन उन्होंने अपनी शारीरिक चुनौतियों को कभी भी अपने लक्ष्य के आड़े नहीं आने दिया। देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक में सफलता प्राप्त कर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे बाधाएं टिक नहीं पातीं।

वहीं अदिति वार्ष्णेय उत्तर प्रदेश के बरेली की रहने वाली हैं। उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा 2022 में 57वीं रैंक हासिल कर सबको चौंका दिया था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा और स्नातक की पढ़ाई दिल्ली के प्रतिष्ठित मिरांडा हाउस महाविद्यालय से हुई है। अदिति के पिता व्यवसाय से जुड़े हैं।

माधव और अदिति की मुलाकात भारतीय प्रशासनिक सेवा की प्रशिक्षण अवधि के दौरान हुई थी। वहीं से बातचीत शुरू हुई, दोस्ती गहरी हुई और फिर यह रिश्ता प्रेम में बदल गया। समय के साथ दोनों ने यह समझा कि वे जीवन की जिम्मेदारियों को साथ निभा सकते हैं। परिवार की सहमति मिलने के बाद उन्होंने भव्य आयोजन की बजाय पंजीकृत विवाह को चुना।

सामाजिक कार्यकर्ता हेमंत गोयल कहते हैं, ‘यह विवाह केवल दो व्यक्तियों का निजी फैसला नहीं है, बल्कि एक सामाजिक संकेत भी है। यह संदेश देता है कि विवाह का अर्थ खर्च और प्रदर्शन नहीं, बल्कि साझेदारी, सम्मान और जिम्मेदारी है। जब देश के युवा प्रशासनिक अधिकारी स्वयं सादगी अपनाते हैं, तो वह समाज के लिए उदाहरण बन जाता है।’

शिक्षाविद् व सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. सुमन चावला कहती हैं, ‘आज जब परंपरा के नाम पर फिजूलखर्ची को सामान्य मान लिया गया है, ऐसे समय में माधव भारद्वाज और अदिति वार्ष्णेय का यह कदम याद दिलाता है कि सादगी कोई कमी नहीं, बल्कि संस्कारों की पहचान है। उनकी यह शुरुआत न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि यह भी दिखाती है कि बदलाव अक्सर छोटे, शांत और सधे हुए फैसलों से शुरू होता है।’





