



डॉ. संतोष राजपुरोहित.
सेवा निवृत्ति के बाद का अर्थशास्त्र उस वित्तीय, सामाजिक और नीतिगत व्यवस्था का अध्ययन है, जो व्यक्ति के नियमित रोजगार से अलग होने के बाद उसके जीवन निर्वाह को प्रभावित करती है। भारत जैसे विकासशील देश में यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यहाँ एक ओर संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को पेंशन, भविष्य निधि और अन्य सामाजिक सुरक्षा सुविधाएँ प्राप्त होती हैं, वहीं दूसरी ओर असंगठित क्षेत्र के करोड़ों श्रमिक वृद्धावस्था में आर्थिक असुरक्षा का सामना करते हैं। बढ़ती जीवन प्रत्याशा, बदलता पारिवारिक ढाँचा और स्वास्थ्य व्यय में निरंतर वृद्धि ने सेवा निवृत्ति के बाद की आर्थिक योजना को अनिवार्य बना दिया है।

संगठित क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों के लिए सेवा निवृत्ति के बाद आय का प्रमुख स्रोत पेंशन, भविष्य निधि तथा ग्रेच्युटी होती है। भारत में राष्ट्रीय पेंशन योजना एक अंशदायी पेंशन योजना के रूप में लागू है, जिसमें कर्मचारी और नियोक्ता दोनों योगदान करते हैं और निवेश बाजार आधारित साधनों में किया जाता है। इसके अतिरिक्त कर्मचारी भविष्य निधि फण्ड के माध्यम से कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) संचालित की जाती है, जो सेवा समाप्ति के बाद एकमुश्त राशि प्रदान करती है। कुछ राज्यों में पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) भी लागू है, जिसमें निश्चित लाभ आधारित पेंशन दी जाती है। इन व्यवस्थाओं के कारण संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को वृद्धावस्था में अपेक्षाकृत स्थिर आय प्राप्त होती है, जिससे उनका उपभोग स्तर संतुलित बना रहता है।

इसके विपरीत, असंगठित क्षेत्र, जिसमें कृषि श्रमिक, निर्माण मजदूर, दिहाड़ी श्रमिक, घरेलू कामगार और लघु व्यवसायी शामिल हैं, के लिए सेवा निवृत्ति का अर्थ अक्सर आय का पूर्णतः समाप्त हो जाना होता है। इन श्रमिकों के पास नियमित पेंशन या भविष्य निधि जैसी सुरक्षा उपलब्ध नहीं होती। इस संदर्भ में सरकार ने अटल पेंशन योजना जैसी योजनाएँ प्रारंभ की हैं, जो असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को न्यूनतम गारंटीकृत पेंशन प्रदान करने का प्रयास करती हैं। इसके बावजूद, सीमित जागरूकता, अनियमित आय और योगदान करने की क्षमता की कमी के कारण इन योजनाओं का लाभ सभी तक नहीं पहुँच पाता। परिणामस्वरूप वृद्धावस्था में आर्थिक निर्भरता परिवार या समाज पर बढ़ जाती है।

सेवा निवृत्ति के बाद के अर्थशास्त्र को समझने में जीवन चक्र परिकल्पना महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिसे फ्रांको मोडीगिलयानी ने प्रतिपादित किया था। इस सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति अपने कार्यकाल के दौरान बचत करता है ताकि वृद्धावस्था में उसका उपभोग स्तर स्थिर बना रहे। संगठित क्षेत्र में यह सिद्धांत व्यवहारिक रूप में दिखाई देता है, जहाँ वेतनभोगी कर्मचारी नियमित बचत और निवेश के माध्यम से भविष्य सुरक्षित करते हैं। वहीं असंगठित क्षेत्र में अनिश्चित आय और सीमित बचत क्षमता के कारण यह संतुलन स्थापित नहीं हो पाता।

मुद्रास्फीति सेवा निवृत्ति के बाद की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती है। स्थिर पेंशन या ब्याज आय पर निर्भर व्यक्ति के लिए कीमतों में वृद्धि क्रय शक्ति को कम कर देती है। स्वास्थ्य व्यय में बढ़ोतरी भी वृद्धावस्था की गंभीर समस्या है। बढ़ती आयु के साथ चिकित्सा खर्च बढ़ता है, जिससे बचत पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। भारत में वृद्धजन आबादी में वृद्धि पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी चिंता व्यक्त की है, क्योंकि आने वाले दशकों में वृद्धजन अनुपात तेजी से बढ़ेगा और सामाजिक सुरक्षा पर दबाव बढ़ेगा।

उपभोग व्यवहार की दृष्टि से सेवा निवृत्ति के बाद व्यक्ति की प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं। आवश्यक वस्तुओं, स्वास्थ्य सेवाओं और आवास पर व्यय बढ़ता है, जबकि विलासिता वस्तुओं पर खर्च घट जाता है। निवेश रणनीति भी अधिक सुरक्षित साधनों की ओर झुक जाती है, जैसे बैंक जमा, सरकारी बॉण्ड या नियमित आय योजनाएँ। हालाँकि वित्तीय विशेषज्ञ 4 फीसदी निकासी नियम जैसी अवधारणाओं का सुझाव देते हैं, परंतु यह नियम बाजार जोखिम और व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
संगठित और असंगठित क्षेत्र के बीच सेवा निवृत्ति सुरक्षा में व्यापक असमानता भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष एक गंभीर चुनौती है। यदि असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा प्रदान नहीं की गई, तो वृद्धावस्था गरीबी में वृद्धि हो सकती है। अतः आवश्यक है कि सार्वभौमिक सामाजिक पेंशन, व्यापक स्वास्थ्य बीमा कवरेज, वित्तीय साक्षरता और वृद्धजन रोजगार अवसरों को बढ़ावा दिया जाए।

अंततः सेवा निवृत्ति के बाद का अर्थशास्त्र केवल व्यक्तिगत बचत या निवेश का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और समावेशी विकास से जुड़ा हुआ विषय है। संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए यदि संतुलित नीतियाँ बनाई जाएँ, तो वृद्धावस्था को आर्थिक असुरक्षा के बजाय सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन चरण में परिवर्तित किया जा सकता है।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं





