



राजेन्द्र सारस्वत
कुछ कलाकार देह से विदा होकर भी समय से विदा नहीं होते। जगजीत सिंह ऐसे ही सुर-साधक थे, जिनकी आवाज़ ने स्मृति को संगीत और संगीत को जीवन बना दिया। गंगानगर उनके लिए केवल जन्मस्थली नहीं, बल्कि भावनात्मक भूगोल है, जहां हर फरवरी उनकी याद सुरों में लौट आती है। सभागार, आयोजन और स्मरण, ये सब औपचारिकताएं नहीं, बल्कि कृतज्ञता के स्वर हैं। जगजीत सिंह का संगीत हमें सिखाता है कि खामोशी भी बोलती है, और सादगी ही सबसे बड़ा वैभव है। ऐसे कलाकार जाते नहीं, बस स्वर बदल लेते हैं और यहीं हमारे बीच रहते हैं।

हमारे सबके चहेते ग़ज़ल की दुनिया के बेताज बादशाह जगजीतसिंह के जन्मदिन 8 फरवरी के दिन गंगानगर शहर के लोग इस महान कलाकार को बहुत शिद्दत से याद किया करते हैं। कला जगत ही नहीं सामाजिक जीवन और साहित्य जगत उनके स्मरण में अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। यह तो आपको विदित ही है कि हमारे इलाके के उनके चाहने वाले कलापारखियों और संगीत प्रेमियों की बार बार मांग उठाए जाने पर तत्कालीन विधायक राजकुमार गौड़ ने बजट मुहैय्या कराया और इस महान कलाकार की याद को चिर स्थाई बनाने के उद्देश्य से गंगानगर में जगजीतसिंह के जन्म स्थान पर एक भव्य आडिटोरियम का निर्माण कार्य करवाया।

असल में किसी मानव का जीना असल में तभी जीना है जबकि इस दुनिया से जाने के बाद भी लोग किसी को आदर, सम्मान और शिद्दत के साथ सच्चे हृदय से याद करें। जगजीत सिंह जैसे महान कलाकार कभी मर ही नहीं सकते। उनके तराने फ़िजाओं में गूंज गूंज कर अपनी मौजूदगी का अहसास करवा रहे हैं। उनके गाए लोकप्रिय गाने, ग़ज़ल और भजन आज हमारे चारों ओर धूम मचा रहें हैं। दुनिया का यह बेहद लोकप्रिय कलाकार जगजीतसिंह अज़र हैं, अमर हैं और हमारे मध्य मौजूद हैं। लगता है कि कहीं आसपास ही उपस्थित हैं और अभी हमारे मध्य आकर गाएगा-
‘दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है,
मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है!’
बस यूट्यूब का बटन दबाया और जगजीत सिंह लिखा-सामने उनकी गाई गज़लों का संसार आ उपस्थित होगा। फिर कैसे कह दें कि जगजीत सिंह इस दुनिया में नहीं हैं।

जिस हस्ती को लोग इतनी शिद्दत से याद कर रहे हैं। उसे स्वर्गीय लिखने को कत्तई जी नहीं करता, पर क्या करें नियति जगत में सर्वाेपरि है। उसके समक्ष समय भी पराजित हो जाता है। गंगानगर के लोग अपने इस लाडले के नाम पर गर्व महसूस करते हैं कि जगजीतसिंह ने गंगानगर के नाम को विश्व पटल पर पहुंचा दिया।

मुझे इस बात पर खुशी है कि मुझे जगजीतसिंह से जीवन में कुल तीन बार रूबरू होने का अवसर मिला। जयपुर में पहली बार 80 के दशक में मैंने उनका लाइव कन्सर्ट तब देखा। जब वे चित्रासिंह के साथ अपनी लोकप्रियता के शुरुआती दौर में कार्यक्रम प्रस्तुत करने आए थे। मुझे भी संयोगवश कार्यक्रम में जाने का सौभाग्य मिला था। तब उनकी लोकप्रिय गज़ल-
‘ये दौलत भी लेलो, ये शोहरत भी लेलो,
भले छीन लो, मुझसे मेरी जवानी,
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश़ती, वो बारिश का पानी’ को विशेष पसंद किया गया था.

दूसरी बार गंगानगर में उनके राष्ट्रीय कला मंदिर के बैनर तले आयोजित कार्यक्रम संभवतः वर्ष 97 में उनको सुनने का अवसर मिला। यह दिसम्बर का महीना था। मगर उनके कार्यक्रम में इतनी गहमागहमी रही कि लगा गर्मी का मौसम है। गंगानगर में जगजीत सिंह का यह पहला ही नहीं अंतिम कार्यक्रम भी था। और तीसरी बार मैंने वर्ष 2000 में जयपुर में ही एक बहुत बड़े स्तर पर आयोजित एक इंटरनेशनल प्रोग्राम में जगजीत सिंह को सुना। इसमें उन्होंने अपने कार्यक्रम की शुरुआत ‘घणी खम्मा सा!’ से की। मुझे याद है वे बोले थे-‘मैं भी राजस्थान गो ही हूं, गंगानगर गो मेरो जन्म है।’

जगजीत सिंह जी ने कहा था-‘राजस्थान की धरती बहुत सुरीली है, इसके टीलों में भी सुरीला संगीत निकलता है।’ तब मुझे मौका मिला और मैने अपने इस चहेते कलाकार से चाहे दो मिनट ही सही रूबरू बात की। उन्हें बताया कि मैं गंगानगर से हूं. आपका प्रोग्राम सुनने आया हूं। उन्होंने मुझसे आत्मीयता से हाथ मिलाया और मैने कार्यक्रम की मैगज़ीन पर ही उनका आटोग्राफ लिया। आपको बता दूँ कि इस कार्यक्रम में एंट्री के लिए बहुत मारामारी थी। उस समय मेरे परममित्र बीएल सोनी जी जयपुर के एसपी थे। मैंने उनसे आग्रह किया। उन्होंने ही मुझे कार्यक्रम का पास उपलब्ध कराया था। इसी कार्यक्रम में पाकिस्तान के मशहूर सिंगर मेहदीहसन साहब, रेशमा जी और शास्त्रीय गायक पंडित भीमसिंह जोशी जी को भी सुनने का अवसर मिला।
जगजीत सिंह ने अपने जीवन में संगीत के लिए जितना काम किया। म्यूजिक लवर्स के लिए कितना कुछ छोड़कर कर गए। इसके बारे में अधिक कुछ कहने सुनने की आवश्यकता नहीं है। वो एक शेर साझा करूं..
‘परिंदा छूएगा आसमान की ऊंचाई,
यह उसके फैले हुए पर बोलते है,
जो लोग रहते हैं खामौश अक्सर,
ज़माने में उनके हुनर बोलते है..!’

दुनिया में आज भी लोग जगजीत सिंह के संगीत के दीवाने हैं। कुछ लोगों ने जगजीत सिंह बनने की बहुत कोशिश की। मगर उन तक तो क्या उनके आसपास भी आजतक कोई पहुँच नहीं पाया है। और लगता है कि भविष्य में उन जैसा कोई कलाकार होगा। ऐसी सम्भावना नहीं लगती। यह अटल सत्य है कि यह जीवन आनी जानी है। दुनिया में जो भी आया है एक दिन उसे पक्का ही जाना है, क्योंकि स्थाई तो यहाँ कुछ भी नहीं है। लेकिन जीवन में किया गया काम कभी नहीं मरता। वो जगजीत सिंह की भांति सदैव जीवित रहता है। उनकी गाई ग़ज़ल से उन्हें स्मरण करता हूँ-
‘शाम से आंख में नमी सी है,
आज फिर आपकी कमी सी है..
दफ़्न करदो हमें के सांस मिले,
नव्ज कुछ देर से थमी सी है,
कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी,
एक तस्लीम लाज़मी सी है।’
-लेखक वरिष्ठ व स्वतंत्र पत्रकार हैं






