



भटनेर पोस्ट डेस्क.
राज्य सरकार की ओर से नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) को भेजे गए प्रोविजन आंकड़े दिसंबर 2025 तक राज्य की आर्थिक स्थिति की एक जटिल तस्वीर पेश करते हैं। एक ओर कर संग्रह में अपेक्षाकृत मजबूती दिखाई दे रही है, वहीं दूसरी ओर बढ़ता राजस्व घाटा, सुस्त पूंजीगत व्यय और उधारी पर बढ़ती निर्भरता सरकार के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए राज्य का कुल बजट अनुमान 3.78 लाख करोड़ रुपये रखा गया था, जिसके मुकाबले दिसंबर तक वास्तविक प्राप्तियां 2.19 लाख करोड़ रुपये रही हैं। यानी अब तक कुल बजट का केवल 58.11 प्रतिशत ही हासिल हो पाया है।
दिसंबर तक राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियां 1.66 लाख करोड़ रुपये रहीं, जो बजट अनुमान का 56.43 प्रतिशत है। कर राजस्व के मोर्चे पर वस्तु एवं सेवा कर, आबकारी शुल्क, मुद्रांक एवं पंजीयन शुल्क तथा बिक्री कर से अपेक्षाकृत संतोषजनक संग्रह दर्ज किया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि राज्य की आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह ठप नहीं हैं और बाजार में लेन-देन जारी है।
हालांकि, इस राहत के बीच गैर-कर राजस्व का प्रदर्शन कमजोर रहा, जो लगभग 50 प्रतिशत पर सिमटा हुआ है। सबसे बड़ी चिंता केंद्र सरकार से मिलने वाले अनुदान को लेकर है, जो लक्ष्य का मात्र 24.45 प्रतिशत ही दिसंबर तक प्राप्त हो सका। केंद्र प्रायोजित योजनाओं पर निर्भर राज्य के लिए यह स्थिति स्वाभाविक रूप से चिंता बढ़ाने वाली है।

यदि पिछले वित्तीय वर्ष 2024-25 की इसी अवधि से तुलना करें तो तस्वीर और साफ होती है। उस समय दिसंबर तक राज्य की राजस्व प्राप्तियां 1.53 लाख करोड़ रुपये थीं, जो बजट अनुमान का 58.33 प्रतिशत थी। तब कर राजस्व के प्रमुख स्रोतों से वर्तमान वर्ष की तुलना में बेहतर संग्रह हुआ था। इसका अर्थ यह है कि मौजूदा वर्ष में नाममात्र की बढ़ोतरी के बावजूद अपेक्षित गति नहीं बन पाई है।

दिसंबर 2025 तक राज्य सरकार का कुल राजस्व व्यय 2.00 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहा, जो बजट का 61.42 प्रतिशत है। इस व्यय का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान पर खर्च हो गया। वेतन पर 67 प्रतिशत, पेंशन पर 71 प्रतिशत और ब्याज भुगतान पर 65 प्रतिशत तक खर्च होना यह दर्शाता है कि सरकार का अधिकांश पैसा नियमित और अनिवार्य मदों में ही सिमट गया। इसके उलट पूंजीगत व्यय, यानी सड़क, बिजली, सिंचाई, स्कूल, अस्पताल और अन्य बुनियादी ढांचे पर खर्च केवल 35.59 प्रतिशत ही हो पाया। आर्थिक दृष्टि से यह संकेत चिंताजनक है, क्योंकि पूंजीगत व्यय ही भविष्य की विकास क्षमता और रोजगार सृजन की नींव रखता है।

आंकड़े बताते हैं कि सामाजिक क्षेत्र पर खर्च की रफ्तार भी थमी हुई है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे सामाजिक क्षेत्रों पर पूंजीगत व्यय केवल 32.94 प्रतिशत रहा, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 40.34 प्रतिशत था। इसी तरह कृषि, उद्योग और परिवहन जैसे आर्थिक क्षेत्रों पर खर्च 45.74 प्रतिशत तक ही सीमित रहा, जो 2024-25 में 64.38 प्रतिशत था। विशेषज्ञों का मानना है कि इन क्षेत्रों में निवेश की कमी का असर आने वाले वर्षों में विकास दर और रोजगार के अवसरों पर पड़ेगा। कमजोर सामाजिक ढांचा सीधे-सीधे मानव संसाधन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।

दिसंबर 2025 तक राज्य का राजस्व घाटा 33,939 करोड़ रुपये पहुंच चुका है, जबकि पूरे वर्ष के लिए यह घाटा 31 हजार करोड़ रुपये अनुमानित किया गया था। यानी मार्च तक यह आंकड़ा और बढ़ने की आशंका है। राजकोषीय घाटा भी 53,303 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है, जो यह दर्शाता है कि राज्य की आय उसके खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसका सीधा अर्थ है कि सरकार को अपने नियमित खर्च चलाने के लिए लगातार कर्ज का सहारा लेना पड़ रहा है। बढ़ती उधारी भविष्य में ब्याज भुगतान का बोझ और बढ़ाएगी, जिससे विकास खर्च के लिए संसाधन और सिमट सकते हैं।

बजट विश्लेषण एवं अनुसंधान केंद्र, जयपुर के निदेशक निसार अहमद के अनुसार दिसंबर तक के आंकड़े मिश्रित संकेत देते हैं। केंद्र से अनुदान की कम प्राप्ति के कारण केंद्र प्रायोजित योजनाओं की रफ्तार धीमी पड़ी होगी। साथ ही पूंजीगत खर्च की सुस्ती लंबे समय में गंभीर परिणाम ला सकती है। विधान सभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार राज्य में 58 प्रतिशत विद्यालय भवन जर्जर स्थिति में हैं। ऐसे में स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों और आंगनबाड़ी भवनों के निर्माण व रखरखाव के लिए पूंजीगत व्यय बढ़ाना अनिवार्य हो जाता है। कुल मिलाकर, राज्य की आर्थिक स्थिति फिलहाल संतुलन के नाजुक मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। कर संग्रह से राहत तो है, लेकिन बढ़ता घाटा और कमजोर विकास खर्च भविष्य के लिए चेतावनी है। अब सवाल यह है कि सरकार आने वाले महीनों में प्राथमिकताओं को कैसे पुनर्संतुलित करती है।





