



भटनेर पोस्ट डेस्क.
शादी-ब्याह के मौसम में अक्सर एक ही चर्चा होती है, कितना भव्य आयोजन था, क्या-क्या व्यंजन बने, कौन-सा गायक आया। लेकिन हनुमानगढ़ के राजपुरोहित परिवार ने इस तयशुदा ढर्रे से हटकर कुछ ऐसा किया कि उनकी बेटी की शादी सिर्फ एक पारिवारिक समारोह नहीं, बल्कि पूरे शहर में चर्चा का विषय बन गई। वजह साफ थी, इस शादी में मेहमान सिर्फ रिश्तेदार और परिचित नहीं थे, बल्कि स्थानीय आश्रम के विशेष बच्चे भी पूरे सम्मान के साथ आमंत्रित थे।

आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ व शिक्षाविद् डॉ. संतोष राजपुरोहित ने अपनी बेटी नवीनता की शादी नागौर निवासी विशन सिंह राजपुरोहित के सुपुत्र अमित के साथ बड़े ही सादे लेकिन अर्थपूर्ण अंदाज़ में संपन्न करवाई। इस आयोजन की खासियत यह रही कि शादी की शुरुआत किसी रस्म या दिखावे से नहीं, बल्कि आश्रम से आए विशेष बच्चों को सबसे पहले भोजन कराने और उनके साथ समय बिताने से हुई।

अक्सर देखने में आता है कि शादी समारोह में बचे हुए भोजन को जरूरतमंदों में बांट दिया जाता है, जो निश्चित रूप से सराहनीय है। लेकिन राजपुरोहित परिवार ने इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए इन बच्चों को ‘बाद में पाने वाले’ नहीं, बल्कि ‘पहले हकदार’ की जगह दी। बच्चों को रिश्तेदारों की तरह मंच पर बुलाया गया, उनके साथ परिवार ने तस्वीरें खिंचवाईं और पूरे आत्मीय भाव से उनका स्वागत किया।

शुरुआत में ये बच्चे थोड़े असहज जरूर दिखे। रोशनी, भीड़ और सजावट उनके लिए नया अनुभव था। लेकिन जैसे-जैसे परिवार और मेहमानों का अपनापन मिला, बच्चों के चेहरे खिलने लगे। हंसी, ताली और उत्साह के साथ उन्होंने शादी का भरपूर आनंद लिया। उनके लिए यह सिर्फ एक भोज नहीं था, बल्कि ऐसा पल था जब उन्हें किसी से अलग या कम नहीं, बल्कि बराबरी का हिस्सा महसूस कराया गया।

शादी में शामिल शहर के कई गणमान्य लोग जब इन विशेष बच्चों को पूरे सम्मान के साथ समारोह में शामिल देखते हैं तो एक पल को जरूर चौंकते हैं। लेकिन वह चौंक जल्द ही प्रशंसा में बदल जाती है। मेहमानों ने खुले दिल से इस पहल की सराहना की और कहा कि ऐसी शादियां समाज को सोचने पर मजबूर करती हैं कि असली खुशी दिखावे में नहीं, संवेदना में है।
डॉ. संतोष राजपुरोहित ने बेहद सहज शब्दों में कहा कि ऐसे आयोजन विशेष बच्चों को खास महसूस कराते हैं। हर दिन तो संभव नहीं, लेकिन जीवन के शुभ और खुशी के अवसर अगर हम इन बच्चों के साथ साझा करें, तो इससे उन्हें आत्मसम्मान मिलता है और समाज को भी सही दिशा का संदेश जाता है। उनका मानना है कि विशेष बच्चे किसी से कम नहीं होते, बस उन्हें थोड़ा ज्यादा अपनापन चाहिए।

गौर करने वाली बात यह भी है कि यह कोई एक बार की पहल नहीं है। राजपुरोहित परिवार में इससे पहले भी हुई शादियों में ऐसे विशेष बच्चों को आमंत्रित किया जाता रहा है। यानी यह दिखावे का प्रयोग नहीं, बल्कि परिवार की सोच और संस्कारों का हिस्सा है। आज जब शादियां खर्च और प्रदर्शन की होड़ बनती जा रही हैं, ऐसे में राजपुरोहित परिवार की यह शादी याद दिलाती है कि असली वैभव इंसानियत में है। शायद इसी वजह से यह विवाह समारोह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक सीख बन गया कि खुशियां बांटने से ही बढ़ती हैं, और जब खास बच्चों के साथ बांटी जाएं, तो वे हमेशा के लिए यादगार बन जाती हैं।





