



डॉ. संतोष राजपुरोहित.
हाल के दिनों में यह चर्चा तेज़ हुई है कि अमेरिका भारत से आने वाले कुछ उत्पादों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने की तैयारी कर रहा है। पहली नज़र में यह खबर किसी बड़े आर्थिक संकट जैसी लगती है। स्वाभाविक है कि जब किसी देश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार इतना भारी शुल्क लगाएगा, तो निर्यात, उद्योग और रोज़गार पर नकारात्मक असर पड़ेगा। लेकिन अर्थव्यवस्था केवल नुकसान और फायदे की सीधी रेखा पर नहीं चलती। कई बार जो संकट दिखाई देता है, वही आगे चलकर नए अवसरों का रास्ता भी खोल देता है। इसलिए यह सवाल ज़रूरी है कि क्या यह स्थिति केवल भारत के लिए संकट है, या इसमें अवसर भी छिपे हुए हैं।

सबसे पहले संकट के पक्ष को समझना आवश्यक है। अमेरिका भारत का एक प्रमुख निर्यात बाज़ार है। आईटी सेवाएँ, फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग सामान, कपड़ा, स्टील और केमिकल जैसे कई क्षेत्र अमेरिका पर काफी हद तक निर्भर हैं। यदि इन उत्पादों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जाता है, तो भारतीय सामान अमेरिका में बेहद महंगा हो जाएगा। इसका सीधा परिणाम यह होगा कि अमेरिकी खरीदार भारत के बजाय दूसरे देशों से सामान मंगाने लगेंगे। इससे भारतीय निर्यात घटेगा, कंपनियों की आय कम होगी और कुछ क्षेत्रों में रोज़गार पर भी दबाव पड़ेगा।

इसके अलावा, छोटे और मध्यम उद्योग सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। बड़ी कंपनियाँ तो किसी हद तक नए बाज़ार ढूँढ सकती हैं या लागत घटाने की कोशिश कर सकती हैं, लेकिन छोटे उद्योगों के लिए यह झटका गंभीर हो सकता है। विदेशी मुद्रा आय घटने से रुपये पर दबाव पड़ सकता है और व्यापार घाटा बढ़ने की आशंका भी बन सकती है। इस दृष्टि से देखा जाए तो यह स्थिति निश्चित रूप से एक बड़ा आर्थिक संकट दिखाई देती है।

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इतिहास गवाह है कि हर बड़ा व्यापारिक झटका देशों को आत्ममंथन और सुधार के लिए मजबूर करता है। अमेरिका का इतना कठोर कदम भारत को अपने निर्यात ढांचे और व्यापार नीति पर दोबारा सोचने का अवसर दे सकता है। अभी भारत का निर्यात कुछ सीमित बाज़ारों और उत्पादों पर ज्यादा निर्भर है। यह संकट भारत को अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे नए उभरते बाज़ारों की ओर तेज़ी से बढ़ने के लिए प्रेरित कर सकता है। दूसरा बड़ा अवसर आत्मनिर्भरता से जुड़ा है। जब बाहरी बाज़ारों में कठिनाई आती है, तो घरेलू उत्पादन और घरेलू खपत को बढ़ाने की ज़रूरत महसूस होती है। यह स्थिति ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों को वास्तविक मजबूती दे सकती है। कंपनियाँ सिर्फ निर्यात पर निर्भर रहने के बजाय देश के अंदर मूल्यवर्धन, नवाचार और गुणवत्ता सुधार पर ध्यान देंगी। इससे दीर्घकाल में भारतीय उद्योग अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकते हैं।

तीसरा अवसर व्यापार कूटनीति का है। इतना बड़ा टैरिफ कदम अपने आप में अंतिम फैसला नहीं होता। अक्सर ऐसे कदम बातचीत की रणनीति होते हैं। भारत के पास यह मौका है कि वह द्विपक्षीय वार्ताओं, विश्व व्यापार संगठन और बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से अपने हितों की मजबूती से पैरवी करे। यदि भारत अपने तर्क, डेटा और वैश्विक समर्थन के साथ आगे बढ़ता है, तो इस टैरिफ को कम या सीमित किया जा सकता है। इसके साथ ही, यह संकट भारत को उच्च तकनीक, हरित ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन और डिजिटल सेवाओं जैसे क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ने के लिए भी प्रेरित कर सकता है। पारंपरिक वस्तुओं के बजाय ज्ञान-आधारित और मूल्यवर्धित निर्यात पर जोर बढ़ेगा, जो भविष्य की अर्थव्यवस्था की असली ताकत है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि अमेरिका द्वारा 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने की तैयारी निश्चित रूप से भारत के लिए एक गंभीर चुनौती है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अल्पकाल में इससे नुकसान, अनिश्चितता और दबाव बढ़ेगा। लेकिन यदि भारत इसे केवल संकट मानकर डर जाए, तो अवसर हाथ से निकल जाएगा। वहीं यदि इसे चेतावनी और सुधार के अवसर के रूप में लिया जाए, तो यही चुनौती भारत को अधिक मजबूत, विविध और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की ओर ले जा सकती है। यह स्थिति सिर्फ संकट नहीं है, बल्कि सही नीतियों, दूरदर्शिता और साहसिक फैसलों के साथ यह भारत के लिए एक बड़ा अवसर भी बन सकती है।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं



