


गोपाल झा.
यह दृश्य अपने आप में प्रतीकात्मक था। मंच पर ‘आधुनिक पुलिसिंग’ की चर्चा होनी थी, प्रस्तुति-पट्टिकाओं में तकनीक, ड्रोन, आँकड़े और कृत्रिम बुद्धिमत्ता चमकने थे, लेकिन असल रोशनी उस क्षण पड़ी जब मुख्यमंत्री ने आईना उठा दिया। आईना भी ऐसा कि पुलिस महकमा खुद अपनी शक्ल देखकर ठिठक गया। बात भविष्य की होनी थी, मगर चर्चा अतीत की आदतों पर अटक गई। और वही अटकाव सबसे बड़ा सवाल बन गया। राजस्थान पुलिस अकादमी का सभागार आमतौर पर तालियों और औपचारिक भाषणों का आदी है। लेकिन 8 जनवरी को तालियों से ज्यादा सन्नाटा बोला। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने जब कहा, ‘गुजरात आतंकवाद निरोधक दस्ते, मुंबई और पंजाब की एजेंसियां राजस्थान की सरहद में आकर कार्रवाई कर गईं और हमारी पुलिस को भनक तक नहीं लगी’, तो यह महज़ एक वाक्य नहीं था, यह तंत्र पर दर्ज हुई एक सख्त तहरीर थी। यह कोई शायराना तंज़ नहीं, सीधी-सादी प्रशासनिक चोट थी। और चोट जब ऊपर से आती है, तो नीचे तक असर दिखता है।

यह छोटी चूक नहीं, यह लापरवाही की वह शक्ल है जिसे प्रशासनिक भाषा में ‘समन्वय की कमी’ कहा जाता है, और आम ज़ुबान में ‘गाफ़िलपन’। खुफ़िया तंत्र का काम ही है पहले जानना, पहले देखना, पहले समझना। अगर दूसरे राज्यों की एजेंसियां यहां अभियान चला जाएं और जिला पुलिस को भनक न लगे, तो सवाल केवल सूचना तंत्र पर नहीं, नीयत और नज़्म दोनों पर उठता है। मुख्यमंत्री का दर्द इसलिए वाजिब है, क्योंकि यह मामला सुरक्षा का है। यहां चूक का मतलब सिर्फ फाइलों में कमी नहीं, ज़मीन पर जोखिम है।

राजनीति ने तो अपना काम कर लिया। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मौका नहीं छोड़ा। हमला भी हुआ, बयान भी आए, और बयानबाज़ी की रवायत भी निभी। लेकिन असल मुद्दा यह नहीं कि कौन किस पर भारी पड़ा। असल मुद्दा यह है कि क्या इस फटकार के बाद पुलिस महकमा अपने तौर-तरीकों पर गौर करेगा या फिर सब कुछ ‘रोज़मर्रा’ की धूल में दब जाएगा। हमारे तंत्र की एक पुरानी बीमारी है, हम चेतावनी को कार्यक्रम समझ लेते हैं और सुधार को फाइल।

‘आधुनिक पुलिसिंग’ केवल नए हथियार, नए वाहन या नए अनुप्रयोग नहीं है। आधुनिकता सबसे पहले सोच में आती है। जब तक थाने की चारदीवारी के भीतर यह यकीन नहीं बैठेगा कि सूचना छुपाना नहीं, साझा करना ताकत है, तब तक कोई सेमिनार काम का नहीं। जब तक मैदानी पुलिस और खुफ़िया तंत्र एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी नहीं, साझीदार नहीं मानेंगे, तब तक हर अभियान में कोई न कोई सुराख़ रह जाएगा। तंत्र अगर सुराख़दार होगा, तो अपराध को रास्ता मिल ही जाएगा। अपराध रास्ता ढूंढता नहीं, वह रास्ता पहचान लेता है।

मुख्यमंत्री ने सही कहा, सिर्फ उपकरणों से पुलिस आधुनिक नहीं बनती। सोच बदलनी पड़ती है, रवैया बदलना पड़ता है। यह बदलाव आदेश से नहीं, आत्मस्वीकृति से आता है। यह मानना पड़ता है कि हां, हमसे चूक हुई। हमारे यहां अक्सर चूक को ढंकने का हुनर ज्यादा है, सुधारने का कम। फाइलों में ‘सब ठीक’ लिख देना आसान है, मैदान में सब ठीक करना मुश्किल। लेकिन अगर अब भी सब ठीक नहीं किया गया, तो अगली बार आईना और बेरहम होगा।

इस पूरे प्रसंग में एक उम्मीद की किरण भी है। कम से कम मंच से सच बोला गया। कम से कम यह स्वीकार हुआ कि तंत्र में खामी है। यह स्वीकारोक्ति अपने आप में पहला क़दम है। मगर पहला क़दम तभी मायने रखता है, जब उसके बाद दूसरा, तीसरा और चौथा क़दम भी आए। वरना यह भी बाकी भाषणों की तरह अभिलेखागार में चला जाएगा, और ज़मीन पर वही पुरानी चाल, वही पुराना हाल।
पुलिस महकमे के लिए यह इम्तिहान है। यह देखना है कि वह इस फटकार को तौहीन समझता है या तहरीक। तौहीन होगी तो बचाव की दीवारें खड़ी होंगी, तहरीक होगी तो सुधार के दरवाज़े खुलेंगे। मुख्यमंत्री का दर्द वाजिब है, जनता की उम्मीद उससे भी बड़ी। अब गेंद वाकई पुलिस के पाले में है। या तो परंपरागत सुस्ती टूटेगी, या फिर अगला सेमिनार भी यही कहानी दोहराएगा, बस मंच बदलेगा, समस्या नहीं। कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। यह वह मोड़ है, जहां से या तो तंत्र सीखता है, या फिर इतिहास खुद को दोहराता है। और इतिहास, जब दोहराता है, तो अक्सर सज़ा के साथ दोहराता है।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रप के चीफ एडिटर हैं



