



डॉ. एमपी शर्मा.
एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में तृतीय वर्ष के छात्र की आत्महत्या केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है। यह उस सपने की टूटन है जिसे परिवार ने सींचा, उस भरोसे का बिखरना है जो समाज ने पाला, और उस व्यवस्था की विफलता है जिसे हमने आदर्श मान लिया। यह घटना हमें झकझोरती है, क्योंकि सवाल एक का नहीं, कई का है, हमारे बच्चे इतनी दूर तक आकर इतना अकेला क्यों महसूस करते हैं कि जीवन छोड़ देना उन्हें सरल लगने लगे? मेडिकल शिक्षा कठिन है, इसमें संदेह नहीं। लेकिन जब परीक्षा, रैंक, अटेम्प्ट और प्रमोशन जीवन के पर्याय बन जाएँ, तब पढ़ाई बोझ बन जाती है। धीरे-धीरे मन में यह भ्रम घर कर लेता है कि असफलता का अर्थ अंत है। इस मानसिक गणित में जीवन की कीमत शून्य हो जाती है, और यही सबसे खतरनाक समीकरण है।

तनाव, अवसाद और चिंता आज भी कई जगह ‘कमजोरी’ कहकर टाल दिए जाते हैं। काउंसलिंग को औपचारिकता बना दिया जाता है, और छात्र अपनी पीड़ा किसी से कह नहीं पाते। जब भीतर का तूफान बाहर बोलने का रास्ता न पाए, तो वह अंदर ही सब कुछ तोड़ देता है। डाँट, अपमान और सार्वजनिक फटकार से सीख नहीं, सिहरन पैदा होती है। ‘हमारे समय में’ की तुलना वर्तमान के संघर्ष को छोटा कर देती है। शिक्षक यदि सहानुभूति का पुल बनें तो छात्र साहस पाता है; यदि डर बनें, तो छात्र चुप्पी ओढ़ लेता है।

‘तुम तो डॉक्टर बनोगे’ कहकर अनजाने में हम भविष्य का बोझ थमा देते हैं। आर्थिक निवेश की याद दिलाना और दूसरों से तुलना करना बच्चे के भीतर अपराधबोध भर देता है। वह टूटता जाता है, पर बोल नहीं पाता, क्योंकि उसे डर है कि सच कहने से प्यार कम हो जाएगा।
हॉस्टल का जीवन, सोशल मीडिया की झूठी चमक और भावनात्मक सहारे की कमी, भीड़ में रहकर भी छात्र अकेला पड़ जाता है। ऊपर से नई मेडिकल कॉलेज व्यवस्था में अपर्याप्त फैकल्टी, अनुभवहीन मार्गदर्शन और असंवेदनशील प्रशासन असुरक्षा बढ़ाते हैं। जब सिस्टम ही सुनने को तैयार न हो, तो छात्र कहाँ जाए?

परिवार रोज़ बात करे, जाँच नहीं। नंबर नहीं, भावनाएँ पूछे। यह संदेश साफ़ दे कि ‘तुम हमारे लिए डॉक्टर नहीं, हमारा बच्चा हो।’ शिक्षक डर नहीं, भरोसा बनाएँ; संवाद करें; मेंटरशिप को जीवंत बनाएं। संस्थान गोपनीय काउंसलिंग, एंटी-बुलिंग तंत्र और मानवीय परीक्षा प्रणाली लागू करें। प्रशासन संवेदनशील बने, उपलब्ध रहे।
‘मजबूत दिखो’ का दबाव हटे। मदद माँगना कमजोरी नहीं, समझदारी माना जाए। विफलता को कलंक नहीं, सीख समझा जाए। क्योंकि एक परीक्षा पूरी ज़िंदगी तय नहीं करती, और हर समस्या का समाधान होता है, मौत समाधान नहीं। जीवन परीक्षा से बड़ा है। एक फेलियर तुम्हारी पहचान नहीं। मदद माँगना तुम्हारा अधिकार है। तुम अकेले नहीं हो, भले ऐसा लगे। अंधेरी सुरंग में भी दरार से रोशनी आती है, बस देख पाने का साहस चाहिए।

आज एक छात्र गया है, कल कोई और न जाए, इसके लिए आँसू नहीं, कदम चाहिए। आरोप-प्रत्यारोप नहीं, संवेदनशीलता चाहिए। यदि हम आज नहीं जागे, तो कल फिर किसी मेडिकल कॉलेज से एक और दुखद खबर आएगी। समय है व्यवस्था बदलने का, संवाद खोलने का, और अपने बच्चों को यह भरोसा देने का कि वे नंबर नहीं, जीवित सपने हैं।
-लेखक जाने-माने सर्जन और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं



