



भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
राजस्थान की अरावली पर्वतमाला एक बार फिर सियासी रणभूमि बन चुकी है। कभी पर्यावरण संरक्षण की प्रतीक मानी जाने वाली यह प्राचीन पर्वत श्रृंखला अब कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच सीधी राजनीतिक टकराव का केंद्र बन गई है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के आक्रामक बयानों ने माहौल गरमा दिया है। दूसरी ओर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ कांग्रेस पर पलटवार करते हुए उसे ही अरावली के दोहन का दोषी ठहरा रहे हैं। राज्यभर में कांग्रेस ने इसे बड़ा जन मुद्दा बना दिया है, तो भाजपा इसे विपक्ष की सियासी हताशा बता रही है।

क्या है पूरा मामला?
अरावली पर्वतमाला देश की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है। यह न केवल भूजल संरक्षण, वर्षा चक्र और जैव विविधता के लिए अहम है, बल्कि उत्तर भारत को मरुस्थलीकरण से बचाने की ढाल भी मानी जाती है। हाल के दिनों में केंद्र सरकार द्वारा अरावली की परिभाषा और भूमि उपयोग से जुड़े कुछ निर्णयों के बाद यह आशंका जताई गई कि इससे खनन गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। इसी बिंदु को लेकर विवाद ने तूल पकड़ा।
कांग्रेस का आरोप है कि केंद्र सरकार अरावली की ‘गलत परिभाषा’ तय कर इस क्षेत्र को खनन माफियाओं के हवाले करना चाहती है। वहीं भाजपा का कहना है कि कांग्रेस जानबूझकर भ्रम फैला रही है और खुद अपने शासनकाल के फैसलों से ध्यान भटकाना चाहती है।

कांग्रेस क्यों कर रही है विरोध?
कांग्रेस इस मुद्दे को पर्यावरण और जनहित से जोड़कर देख रही है। पार्टी का कहना है कि अरावली के कमजोर होने से राजस्थान में जल संकट और गहराएगा, तापमान बढ़ेगा और प्राकृतिक संतुलन बिगड़ेगा। अशोक गहलोत और सचिन पायलट जैसे नेता इसे ‘भावी पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा सवाल’ बता रहे हैं। कांग्रेस यह भी आरोप लगा रही है कि केंद्र सरकार ने राज्यों से परामर्श किए बिना ऐसे फैसले लिए, जिससे संघीय ढांचे की भावना को ठेस पहुंची है। राज्यभर में कांग्रेस द्वारा जनसभाएं, मार्च और प्रदर्शन कर यह संकेत दिया जा रहा है कि पार्टी इस मुद्दे को लंबे आंदोलन में बदलने के मूड में है। विपक्ष इसे भाजपा सरकार की कथित जनविरोधी और पर्यावरण विरोधी नीतियों का प्रतीक बताकर जनता को अपने पक्ष में लामबंद करने की कोशिश कर रहा है।

केंद्र और राज्य सरकार के फैसले क्या हैं?
भाजपा सरकार का दावा है कि अरावली को लेकर कोई भी फैसला पर्यावरणीय नियमों के दायरे में ही लिया गया है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा साफ कह चुके हैं कि अरावली पर्वतमाला के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उनका आरोप है कि कांग्रेस अपने कार्यकाल में खुद अरावली क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खनन पट्टे जारी करती रही और अब नैतिकता का पाठ पढ़ा रही है।
भाजपा यह भी सवाल उठा रही है कि वर्ष 2002-03 और 2009-10 के दौरान अरावली की परिभाषा में बदलाव किसने किया और उस दौर में कितने खनन पट्टे दिए गए। सत्तापक्ष इसे तथ्यों की लड़ाई बताकर कांग्रेस को कटघरे में खड़ा करने की रणनीति पर काम कर रहा है।

इस सियासी बहस के मायने क्या हैं?
जानकारों का कहना है कि अरावली का मुद्दा केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। इसके भीतर सत्ता, संसाधन और विश्वास की राजनीति छिपी है। कांग्रेस इसे ग्रामीण, आदिवासी और पर्यावरण प्रेमी वर्ग से जोड़कर देख रही है, जबकि भाजपा इसे विकास और संतुलन के नजरिये से पेश करना चाहती है। यह बहस उस बड़े सवाल को भी जन्म देती है कि विकास बनाम पर्यावरण के टकराव में सरकारों की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए। साथ ही यह मुद्दा आने वाले स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों से पहले राजनीतिक जमीन तैयार करने का माध्यम भी बन रहा है। कांग्रेस के लिए यह मौका है सरकार को घेरने का, वहीं भाजपा इसे विपक्ष की ‘सियासी नौटंकी’ बताकर पलटवार कर रही है।

आगे क्या हो सकता है परिणाम?
संभावना है कि आने वाले दिनों में अरावली मुद्दे पर सियासी बयानबाजी और तेज होगी। कांग्रेस इसे सड़क से सदन तक ले जाने की रणनीति पर काम कर सकती है। वहीं भाजपा तथ्य और पुराने आंकड़ों के सहारे विपक्ष को जवाब देने की तैयारी में है। अगर मामला अदालत या किसी राष्ट्रीय मंच तक पहुंचता है तो यह बहस और व्यापक हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अरावली अब केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं रही, बल्कि राजस्थान की राजनीति का नया शक्ति केंद्र बनती जा रही है। इस संघर्ष का परिणाम चाहे जो हो, लेकिन यह तय है कि अरावली का नाम आने वाले समय में राजनीति के साथ-साथ पर्यावरण विमर्श के केंद्र में बना रहेगा।



