




गोपाल झा.
यह दौर काग़ज़ से फिसलकर स्क्रीन पर आ चुका है। स्याही की खुशबू अब नोटिफिकेशन की आवाज़ में बदल गई है। मीडिया के परिदृश्य में यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि तकनीक, समय और समाज की सामूहिक आदतों का स्वाभाविक परिणाम है। प्रिंट मीडिया का दायरा सिकुड़ रहा है, टीवी पत्रकारिता भी टीआरपी और शोर के चक्रव्यूह में फँसी दिखाई देती है। पाठक और दर्शक अब न्यूज़ रूम नहीं, मोबाइल स्क्रीन पर बसे हैं। ऐसे समय में डिजिटल पत्रकारिता केवल विकल्प नहीं, बल्कि एक नई संभावना बनकर उभरी है।

डिजिटल मीडिया ने उन पत्रकारों को मंच दिया है जिनके पास हुनर है, जिजीविषा है और बिना किसी बड़े बैनर के अपनी पहचान गढ़ने का साहस है। उत्तर बिहार, खासकर मिथिलांचल के कुछ युवा डिजिटल पत्रकारों द्वारा गठित ‘डिजिटल मीडिया संघ’ इसी साहस का उदाहरण है। हाल-फिलहाल सामने आए एक वीडियो में रविकांत, विवेक मुस्कान, विकास, वरुण, अजय, गौरव जोशी जैसे युवा चेहरे दिखते हैं, आँखों में चमक, बातों में ठहराव और सोच में परिपक्वता। संगठन का नामकरण वोटिंग से होना, सदस्यता की स्पष्ट पात्रता तय करना और पेशेवर मानकों पर जोर देना इस बात का संकेत है कि यह पहल वैचारिक है। यहाँ सदस्य वही हैं जिनके पास पत्रकारिता की औपचारिक शिक्षा है या फिर दो दशकों से अधिक का अनुभव, यानी योग्यता को प्राथमिकता।

इस पहल के पीछे एक टीस है, उपेक्षा की टीस। वह टीस जो प्रिंट और टीवी में वर्षों खपाने के बावजूद पहचान और सम्मान के अभाव से उपजती है। सच यह है कि किसी बड़े अख़बार या चैनल में काम करना अपने-आप में ‘अच्छा पत्रकार’ होने की गारंटी नहीं देता। सीनियरिटी कई बार अनुभव का नहीं, जड़ता का प्रमाण बन जाती है। इसके उलट, कई जूनियर पत्रकार अपनी समझ, मेहनत और नैतिक दृढ़ता से कहीं बेहतर काम करते हैं। पत्रकारिता पद से नहीं, दृष्टि से बनती है।

याद आता है एक दशक पहले लिया गया वह साक्षात्कार, जब दैनिक हिंदुस्तान के वरिष्ठ संपादक प्रताप सोमवंशी ने साफ़ कहा था, ‘अब किसी नामचीन संस्थान में नौकरी करना मजबूरी नहीं। हुनर है तो मंच अपने-आप बनता है।’ उन्होंने यू-ट्यूब को प्रभावी माध्यम बताया था। आज समय ने उनकी बात पर मुहर लगा दी है। अगर यू-ट्यूब न होता, तो मुख्यधारा से बाहर किए गए कई वरिष्ठ पत्रकारों का अस्तित्व क्या होता? आज उनके नाम पर करोड़ों सब्सक्राइबर हैं, करोड़ों व्यूज़ हैं। जाहिर है, मंच बदला है, प्रभाव नहीं।

इसके बावजूद, यू-ट्यूबर शब्द को आज भी कई जगह हेय दृष्टि से देखा जाता है। यह दृष्टि अनुचित है। हेयता का पात्र वह है जो पत्रकारिता का दुरुपयोग करता है, चाहे वह बड़े मीडिया हाउस का पत्रकार हो या स्वतंत्र डिजिटल क्रिएटर। जो सत्ता की चाकरी करे, खबर को सौदे में बदले, वही दोषी है। माध्यम नहीं, आचरण निर्णायक होना चाहिए। अगर कोई यू-ट्यूबर पत्रकारिता के मानकों पर काम करता है, तो उसका सम्मान होना चाहिए। शुरुआती दौर में ‘द लल्लनटॉप’ के माध्यम से सौरभ द्विवेदी ने यह दिखाया भी था कि डिजिटल मंच पर भी गंभीर और जिम्मेदार पत्रकारिता संभव है।

समस्या तब पैदा होती है जब बिना समझ, बिना प्रशिक्षण और बिना जिम्मेदारी लोग इस पेशे में उतर आते हैं। नतीजा यह होता है कि कुछ लोगों की हल्की हरकतें पूरे पेशे की साख पर सवाल खड़े कर देती हैं। इसलिए डिजिटल मीडिया संघ जैसे संगठनों की भूमिका अहम हो जाती है। ये संगठन न केवल एकजुटता देते हैं, बल्कि आंतरिक अनुशासन भी पैदा करते हैं। तथ्य हों तो खबर दिखाने में हिचक नहीं होनी चाहिए। साहस के बिना पत्रकारिता केवल सूचना बनकर रह जाती है।

युवाओं के लिए संदेश साफ़ है, ‘कद’ बनाइए, ‘पद’ के लिए जमीर का सौदा मत कीजिए। पद आते-जाते रहते हैं, कद बनाना कठिन होता है। इसके लिए लालच से दूरी, चुनौतियों से मुठभेड़ और कानून के प्रति सम्मान जरूरी है। जब तक हम सही हैं, तब तक बोलना हमारा अधिकार है। जिस दिन समझौता शुरू हुआ, उस दिन आवाज़ खुद-ब-खुद कमजोर पड़ जाती है। यह अलग बात है कि कुछ लोगों को ‘चोरी और सीनाजोरी’ में महारत हासिल है। ऐसे लोग स्वयंभू होते हैं, जनता में उनकी स्वीकार्यता नहीं होती।
बहरहाल, सरकार की भी जिम्मेदारी है कि डिजिटल मीडिया के लिए स्पष्ट मापदंड तय करे। गोपनीयता, संतुलन और सत्यापन की सीमाएँ स्पष्ट हों। किसी की छवि धूमिल करने का अधिकार किसी को नहीं, यह नागरिक धर्म है। पत्रकारिता लोकतंत्र की आँख है, अगर आँख ही धुंधली हो जाए, तो समाज अंधा हो जाता है। डिजिटल युग में यही चुनौती है और यही अवसर भी।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं



