



डॉ. संतोष राजपुरोहित.
मानव विकास के दो प्रमुख स्तंभ हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य। किसी भी देश की उत्पादकता, श्रम गुणवत्ता और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता इन्हीं पर आधारित होती है। किंतु भारत जैसे विकासशील देशों में इन दोनों क्षेत्रों का अर्थशास्त्र अब सामाजिक निवेश से अधिक आर्थिक बोझ बनता जा रहा है। राजस्थान में भी यही स्थिति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जहाँ मुख्यमंत्री चिरंजीवी योजना और आरजीएचएस जैसी योजनाओं ने उम्मीदें जगाईं, वहीं इनके क्रियान्वयन में अनेक आर्थिक व प्रशासनिक विसंगतियाँ भी सामने आई हैं।

शिक्षा को ‘मानव पूंजी में निवेश’ कहा जाता है क्योंकि यह व्यक्ति की उत्पादकता और आय में वृद्धि करती है। परंतु आज शिक्षा इतनी महँगी हो गई है कि यह गरीब और मध्यम वर्ग के लिए भारी बोझ बन चुकी है। निजी विद्यालयों, कोचिंग संस्थानों और उच्च शिक्षा संस्थानों की फीस हर साल तेज़ी से बढ़ रही है।

सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी, अधूरी सुविधाएँ और गुणवत्ताहीन शिक्षण पद्धति के कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने के लिए परिवार निजी संस्थानों की ओर झुक रहे हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थिति तो ओर भी दयनीय हैं। परिणामस्वरूप, माता-पिता को बच्चों की शिक्षा के लिए ऋण लेना पड़ता है या बचत समाप्त करनी पड़ती है। यह स्थिति विशेष रूप से ग्रामीण व अर्धशहरी क्षेत्रों में और भी गंभीर है, जहाँ शिक्षा का खर्च परिवार की आय का बड़ा हिस्सा खा जाता है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में स्थिति और भी विकट है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में लगभग 60 फीसदी स्वास्थ्य व्यय लोग अपनी जेब से करते हैं। अचानक बीमारियाँ, जैसे हृदय रोग, कैंसर या दुर्घटनाएँ, परिवारों को आर्थिक संकट में डाल देती हैं। अस्पतालों के ऊँचे बिल और दवाओं की बढ़ती कीमतें गरीब वर्ग को ऋण और गरीबी के जाल में फँसा देती हैं।

राजस्थान सरकार की मुख्यमंत्री चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना और RGSH जैसी योजनाएँ इस संकट से निपटने के लिए शुरू की गईं। इनसे लाखों लोगों को निःशुल्क या रियायती उपचार का लाभ मिला है। परंतु इन योजनाओं की जमीनी स्थिति मिश्रित है।

चिरंजीवी योजना के तहत निजी अस्पतालों को सरकार द्वारा भुगतान में देरी की समस्या गंभीर रूप ले चुकी है। भुगतान समय पर न होने से अस्पतालों में लाभार्थियों के प्रति उदासीनता बढ़ी है, और कई बार उपचार से इनकार तक की घटनाएँ हुई हैं। इसी तरह आरजीएचएस योजना में भी फर्जी बिलिंग, भुगतान में देरी और भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। अस्पतालों में ‘कमीशन कल्चर’ और प्रशासनिक उदासीनता ने इन योजनाओं की विश्वसनीयता को प्रभावित किया है। कई बार लाभार्थियों को न तो पूरी जानकारी मिलती है और न ही सेवा का समय पर लाभ। इन सबके कारण सरकारी योजनाएँ अपने उद्देश्य से भटक जाती हैं, जहाँ सहायता का स्थान निराशा ले लेती है।

शिक्षा और स्वास्थ्य पर बढ़ता व्यय अब गरीबी का नया कारण बन रहा है। उच्च शिक्षा या आकस्मिक बीमारियों का खर्च वहन करने के लिए परिवारों को कर्ज लेना पड़ता है। ब्याज और ऋण-चक्र उन्हें लंबे समय तक आर्थिक रूप से जकड़े रखता है। ग्रामीण परिवारों में यह स्थिति और भी गंभीर है, जहाँ स्वास्थ्य संबंधी खर्चों के कारण लोग भूमि या आभूषण तक बेचने को विवश हो जाते हैं।

यह दुष्चक्र बीमारी, कर्ज और गरीबी भारत के आर्थिक विकास को भीतर से कमजोर कर रहा है। जब व्यक्ति अपने स्वास्थ्य या शिक्षा पर खर्च करने में ही असमर्थ हो जाता है, तो उसकी उत्पादकता घटती है और वह श्रम बाजार में पिछड़ जाता है।
शिक्षा और स्वास्थ्य को केवल ‘खर्च’ नहीं बल्कि राष्ट्रीय निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए। सरकार को इन क्षेत्रों में पारदर्शिता, दक्षता और निगरानी को सुदृढ़ बनाना आवश्यक है। योजनाओं का लाभ तभी प्रभावी होगा जब उनका भुगतान समय पर हो और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जाए।

निजी क्षेत्र को भी सामाजिक उत्तरदायित्व के अंतर्गत इन क्षेत्रों में योगदान देना चाहिए। शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाने के लिए सरकारी-निजी साझेदारी का सशक्त रूप अपनाना होगा। राजस्थान जैसे राज्य, जहाँ चिरंजीवी और आरजीएचएस जैसी योजनाएँ जनकल्याण का प्रतीक बन सकती हैं, वहाँ घोषणाओं से अधिक क्रियान्वयन की सच्चाई मायने रखती है। यदि भुगतान समय पर हो, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे और लाभार्थी को सम्मानजनक व्यवहार मिले कृ तो ये योजनाएँ वास्तव में गरीब की जीवनरेखा बन सकती हैं।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं


