





शंकर सोनी.
हनुमानगढ़ जिला मुख्यालय पर जिला कलेक्टर कार्यालय के सामने स्थानीय धाणका समाज के लोग पिछले लगभग 18 दिनों से धरने पर बैठे हैं। किंतु सरकार और प्रशासन के स्तर पर अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई है। धाणका समाज का कहना है कि उनकी जाति अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में आती है, फिर भी उन्हें अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र नहीं दिया जाता। इसके कारण उनके युवाओं को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा। एक अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता होने के नाते मैंने इस विषय का अध्ययन किया और वास्तविक स्थिति को जनता के सामने रखना आवश्यक समझा।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों की सूची को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है। अनुच्छेद 341 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा अनुसूचित जातियों की सूची तथा अनुच्छेद 342 के अंतर्गत अनुसूचित जनजातियों की सूची 1950 में राजपत्र (गजट) में अधिसूचित की गई थी। इन सूचियों में संशोधन करने का अधिकार केवल संसद को है।

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) अधिनियम, 1976 के माध्यम से इन सूचियों में संशोधन कर नई सूची प्रकाशित की गई। इस संशोधित सूची में राजस्थान की अनुसूचित जनजातियों में “धाणका” को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया। इसका अर्थ यह है कि राजस्थान राज्य की भौगोलिक सीमा के भीतर धाणका समुदाय अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्य है।
इसके बावजूद हनुमानगढ़ जिले में स्थानीय प्रशासन द्वारा धाणका समाज को अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी करने में लगातार बाधाएँ खड़ी की जाती रही हैं। यह तर्क दिया जाता है कि इस जिले में “धाणका” अनुसूचित जनजाति के अंतर्गत मान्य नहीं है।

यह दृष्टिकोण संविधान और अधिसूचना दोनों के विपरीत है। एक बार जब संसद द्वारा संशोधित अधिसूचना में “धाणका” को राजस्थान की अनुसूचित जनजातियों में शामिल कर लिया गया, तो राज्य अथवा जिला स्तर पर इसे सीमित करने या अमान्य ठहराने का कोई अधिकार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र राज्य बनाम मिलिंद (2001) एवं अन्य प्रकरणों में स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार या कोई अन्य प्राधिकरण अपनी ओर से यह तय नहीं कर सकता कि कोई जाति केवल कुछ जिलों में मान्य होगी या नहीं। यदि राष्ट्रपति की अधिसूचना (संशोधित) में कोई जाति/जनजाति शामिल है, तो वह पूरे राज्य में मान्य होगी।

इसी सिद्धांत की पुष्टि राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर खंडपीठ, ने भी की है। न्यायालय ने कहा है कि यदि किसी जाति/जनजाति को संसद की अधिसूचना में शामिल कर लिया गया है, तो राज्य या जिला स्तर पर प्रमाणपत्र देने से इंकार करना अवैध और असंवैधानिक होगा। जिला प्रशासन का कार्य केवल इतना है कि वह यह जांच करे कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में उस जाति/जनजाति से संबंध रखता है या नहीं।

स्पष्ट है कि धाणका समुदाय 1976 के संशोधन अधिनियम से राजस्थान की अनुसूचित जनजाति है। सुप्रीम कोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट दोनों के निर्णय इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि जिला प्रशासन को जाति सूची में कोई छेड़छाड़ करने का अधिकार नहीं है। अतः हनुमानगढ़ जिला प्रशासन द्वारा धाणका समाज को अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र देने से इंकार करना न केवल असंवैधानिक और अवैध है, बल्कि न्यायालयीन निर्णयों के भी प्रतिकूल है।
-लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता व नागरिक सुरक्षा मंच के संस्थापक हैं




