






भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
धौलपुर में रामकथा के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने जो बातें कहीं, उन्हें केवल धर्म और आस्था के घेरे में नहीं बांधा जा सकता। ‘वनवास’ को जीवन का हिस्सा बताकर उन्होंने न केवल भगवान राम की कथा से जोड़ने की कोशिश की बल्कि खुद के राजनीतिक जीवन के अनुभवों को भी परोक्ष रूप से सामने रखा। यह संदेश था कि राजनीतिक उतार-चढ़ाव स्थायी नहीं होते, आज सत्ता में हैं तो कल विपक्ष में, और विपरीत परिस्थितियाँ भी अस्थायी होती हैं।

इस कथन को मौजूदा भाजपा की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है, जहाँ वसुंधरा राजे पिछले कुछ समय से ‘वनवास’ जैसी स्थिति झेल रही हैं, पार्टी की राजनीति में हाशिए पर धकेले जाने की चर्चाओं के बीच उनका यह संदेश आत्मस्वीकृति और भविष्य की संभावनाओं का संकेत है।

राजे ने कहा कि ‘राम राज्य का मतलब है 36 कौम साथ रहें, प्यार से जिएं।’ यह वाक्य सीधे तौर पर समावेशिता और सामाजिक संतुलन की ओर इशारा करता है। राजस्थान की राजनीति में जातीय समीकरण सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं। राजे के इस कथन में कहीं न कहीं आने वाले चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखकर सामाजिक समरसता का संदेश छिपा है।

दरअसल, भाजपा में आंतरिक खींचतान और गुटबाज़ी के दौर में वसुंधरा का यह संदेश अपनी प्रासंगिकता को फिर से स्थापित करने का एक तरीका भी माना जा रहा है।

राजे ने कहा कि ‘दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है, जो आया है वह जाएगा भी। और आदमी डरता है क्योंकि वह जानता है कि वह गलत कर रहा है।’ यह बातें धार्मिक उपदेश जैसी लगती हैं, लेकिन राजनीतिक व्याख्या यह भी है कि वे सत्ता और विपक्ष दोनों पक्षों को संदेश दे रही हैं, राजनीति में गलत आचरण, छल-कपट और अहंकार टिकाऊ नहीं होता।

इस वक्त भाजपा में नेतृत्व को लेकर चल रही अंदरूनी कशमकश में यह इशारा साफ़ दिखाई देता है। राजे ने परोक्ष रूप से उन नेताओं को निशाना बनाया हो सकता है जो उन्हें हाशिए पर रखने की कोशिश कर रहे हैं।

रामकथा के मंच पर दिया गया यह भाषण उस समय आया है जब राजस्थान की राजनीति नए समीकरणों के दौर से गुजर रही है। भाजपा में केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका मज़बूत है, पर राज्यस्तर पर नेताओं के बीच खींचतान जारी है। ऐसे में वसुंधरा का यह धार्मिक-दार्शनिक अंदाज़ उनके लिए ‘राजनीतिक पुनरागमन’ की पृष्ठभूमि तैयार करता नज़र आ रहा है।

क्या वसुंधरा राजे ने ‘वनवास’ शब्द का इस्तेमाल अपने राजनीतिक वनवास की ओर संकेत देने के लिए किया? ‘राम राज्य’ और ‘36 कौम’ वाला बयान क्या सामाजिक-राजनीतिक एकता का चुनावी संदेश है? ‘डर’ और ‘धैर्य’ की बातें क्या भाजपा संगठन और विपक्ष दोनों के लिए चेतावनी हैं?

वरिष्ठ पत्रकार विमल चौहान ‘भटनेर पोस्ट डॉट कॉम’ से कहते हैं, ‘वसुंधरा राजे का यह भाषण धार्मिक पृष्ठभूमि में दिया गया, लेकिन उसके भीतर राजनीति की परतें साफ़ झलकती हैं। उन्होंने खुद को एक तपस्विनी, धैर्यशील और संघर्ष से न हारने वाली नेता के रूप में प्रस्तुत किया। सामाजिक समरसता और रामराज्य के आदर्शों को जोड़कर राजस्थान की विविध जातियों और समुदायों को साधने की कोशिश की। और सबसे महत्वपूर्ण, उन्होंने यह संदेश दिया कि राजनीति का वनवास स्थायी नहीं होता, कभी ऊपर, कभी नीचे का चक्र चलता रहता है। इसलिए वसुंधरा राजे ने रामकथा के मंच को अपने राजनीतिक पुनरागमन का संकेत देने के लिए इस्तेमाल किया है।’


