






शंकर सोनी.
आज जैन के धर्म संवत्सरी-पर्युषण के अवसर ख्याल आया कि हमें इस पवित्र पर्व से प्रेरणा लेते हुए वर्तमान परिस्थितियों में क्षमा दिवस का आयोजन राजनीति को आत्ममंथन और नई शुरुआत की राह दिखा सकता है। जैन धर्म में संवत्सरी-पर्युषण के अवसर पर क्षमा पर्व मनाया जाता है। इस दिन प्रत्येक व्यक्ति ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ कहकर सभी से क्षमा माँगता है। इसका भाव है यदि मेरे मन, वचन या कर्म से आपको कोई दुख पहुँचा हो तो मैं क्षमा चाहता हूँ।

‘खमाउ सा’, ‘उत्तम क्षमा’ और ‘खमत खामणा’ जैसे वाक्य इसी भावना के प्रतीक हैं। यह परंपरा हमें सिखाती है कि सच्चा धर्म क्षमा में है, और क्षमा ही मनुष्य को अहंकार से मुक्त कर सच्चा आत्मबल प्रदान करती है। वर्तमान राजनीति में क्षमा दिवस की आवश्यकता है। भारत का लोकतंत्र जनता के विश्वास पर टिका हुआ है। परंतु स्वतंत्रता के बाद से अब तक राजनीति में कई बार ऐसे प्रसंग आए हैं, जब राजनीतिक दलों ने जनता को निराश किया।

भ्रष्टाचार, परिवारवाद, सत्ता-लालसा, जाति-धर्म आधारित राजनीति और अपराधियों को बढ़ावा देने जैसी गलतियाँ बार-बार सामने आईं। यदि जैन धर्म की क्षमा परंपरा को राजनीति से जोड़ा जाए, तो क्षमा दिवस पर सभी राजनीतिक दल जनता के सामने अपनी-अपनी गलतियाँ स्वीकार करें और माफी माँगें और राजनीतिक शुचिता का संकल्प करें।

यह कदम जनता का विश्वास पुनः जीतने का अवसर बनेगा। यह लोकतंत्र की पवित्रता को बनाए रखने का मार्ग प्रशस्त करेगा। यह भावी राजनीति को ईमानदारी, पारदर्शिता और सेवा भावना की दिशा देगा। यदि क्षमा दिवस पर सभी राजनीतिक दल यह प्रण लें कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम होगी। चुनावी घोषणाएँ केवल वादे नहीं, बल्कि पवित्र संकल्प होंगी। राजनीति से अपराध और भ्रष्टाचार को दूर करने का ठोस प्रयास होगा। जनता के विश्वास और लोकतंत्र की गरिमा सर्वाेच्च प्राथमिकता होगी।

क्षमा दिवस केवल बीते अपराधों की क्षमा याचना नहीं, बल्कि भविष्य को नई दिशा देने का संकल्प है। जब राजनीतिक दल जैन परंपरा से प्रेरणा लेकर जनता के सामने नतमस्तक होकर ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ कहेंगे, तभी लोकतंत्र सशक्त और जीवंत बनेगा।
-लेखक नागरिक सुरक्षा मंच के संस्थापक और वरिष्ठ अधिवक्ता हैं





