





शंकर सोनी.
यह हम सब जानते हैं कि दिमाग का काम सोचना है। यह हर समय सोचता रहता है पर हमें यह भी पता होना चाहिए कि दिमाग को सोचने के लिए विषय हम देते हैं। यह हमारी ईच्छा शक्ति है कि हम हमारे दिमाग को सोचने के लिए विषय दें । सोशल मीडिया और स्मार्टफोन हाथ में आने के बाद हमारे दिमाग के सामने असंख्य विषय आते है। जिन पर सोच-सोच कर हम अनावश्यक टेंशन ले रहे हैं।

आज चर्चा करेंगें कि आम आदमी को कहाँ तक सोचना चाहिए। आम आदमी की ज़िंदगी साधारण दिखती है, लेकिन उसके भीतर अनगिनत बोझ छुपे होते हैं। रोज़गार की चिंता, परिवार की देखभाल, बच्चों का भविष्य, और समय-समय पर समाज व देश की उलझनें।

उसके पास न आराम का समय है, न बहस की गुंजाइश। ऐसे में यह सवाल सबसे अहम हो जाता है। आखिर, आम आदमी को कहाँ तक सोचना चाहिए? सोचना इंसान को इंसान बनाता है। यही उसकी सबसे बड़ी पूँजी है। लेकिन सोच की भी एक सीमा है। जब सोच समस्या का हल देती है तो वह वरदान है, और जब सोच केवल चिंता और विवाद को जन्म देती है तो वही सोच बोझ बन जाती है।

आम आदमी को अपनी सोच को सीमित करना होगा। इतनी कि जीवन सुधरे, समाज बेहतर बने, लेकिन इतनी नहीं कि वह खुद को ही खा जाए। बीते समय में समाज में छुआछूत, ऊँच-नीच और जात-पात जैसी कई बुराइयां थी। समाज में संघर्ष हुए, सुधार भी हुए। लेकिन आज भी वही बहसें जीवित हैं।

आम आदमी को अपने आप से पूछना चाहिए, क्या इन पुराने घावों को बार-बार कुरेदना समझदारी है, या उन्हें पीछे छोड़कर बराबरी और इंसानियत की ओर बढ़ना ही सच्चा रास्ता है ? ईश्वर है या नहीं “धर्म मार्गदर्शक है या अफ़ीम है ? ये सवाल सदियों से पूछे जाते रहे हैं। इनका कोई अंतिम उत्तर कभी नहीं मिला। लेकिन इन विवादों ने समाज में दरारें ज़रूर डाली हैं। आम आदमी अगर इन्हीं पर दिन-रात सोचता रहे तो उसका जीवन व्यर्थ हो जाएगा। उसके लिए सबसे बड़ी सच्चाई यही होनी चाहिए कि धर्म का असली मक़सद इंसान को जोड़ना है, तोड़ना नहीं।

आज दुनिया के किसी न किसी कोने में युद्ध जारी है। लाखों लोग बेघर हो रहे हैं, निर्दाेष मर रहे हैं। आम आदमी इन दृश्यों से दुखी होता है, लेकिन उसके लिए यह भी समझना ज़रूरी है कि हर वैश्विक राजनीति को अपने कंधों पर लादना संभव नहीं। उसकी भूमिका छोटी पर महत्वपूर्ण हैकृअपने पड़ोस, अपने मोहल्ले, अपने समाज में अमन बनाए रखना।

आम आदमी की सबसे बड़ी समझदारी इसी में है कि वह सोच की सीमा पहचाने। उतना ही सोचे जितना जीवन को दिशा देता है। उतना सोचे जितना इंसानियत और सुधार को आगे बढ़ाता है। पर उतना कभी न सोचे जिससे केवल विवाद और बेचौनी बढ़े। आम आदमी की असली ताक़त उसकी सादगी में है, और उसकी सादगी तभी सुरक्षित है जब वह सोच को साधन बनाए, बोझ नहीं। अनावश्यक मुद्दों पर सोचकर अपनी ऊर्जा को कम न करें अपने आसपास छोटी सी दुनियां अपना छोटा सा आसमान बनाएं और उस दायरे में मन लगाकर जिए।
-लेखक नागरिक सुरक्षा मंच के संस्थापक हैं



