





मुकेश भार्गव.
हनुमानगढ़ टाउन की धरती आज जिस रौनक और जीवन से सराबोर है, उसका इतिहास जब पलटकर देखते हैं तो कुछ गिनी-चुनी कहानियाँ ही उसमें प्राण फूंकती दिखती हैं। उन्हीं में से एक है हमारे दादाजी अन्नुराम भार्गव की कहानी। उस वक्त, जब हनुमानगढ़ टाउन में मुश्किल से पंद्रह परिवार रहते थे, दादाजी ने यहाँ बसेरा बनाया। आज यह शहर सौ वर्षों से अधिक पुरानी हमारी पारिवारिक उपस्थिति का साक्षी है।

इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि वर्ष 1927 में हमारे आवासीय भूखंड का पट्टा बन चुका था। इसका अर्थ यही है कि हमारे पूर्वज उस दौर में इस नए कस्बे की नींव के साथ ही अपने सपनों और श्रम की गाथा इसमें पिरो चुके थे। दादाजी केवल एक गृहस्थ नहीं थे, वे समाज के लिए एक संजीवनी थे। आयुर्वेद और ज्योतिष का गहन अध्ययन उन्होंने तारानगर से किया था। उनकी पहचान एक जाने-माने वैद्य और ज्योतिषाचार्य के रूप में पूरे इलाके में थी।

उनके द्वार पर केवल आम लोग ही नहीं, बल्कि राजनीति के बड़े चेहरे भी आकर मार्गदर्शन पाते थे। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी भजनलाल जैसे दिग्गज भी उनके पास आते थे। यह केवल उनकी विद्वता का सम्मान नहीं था, बल्कि उनकी उस संयमित और सुसंस्कृत जीवनशैली का भी प्रमाण था, जिसने उन्हें समाज का मार्गदर्शक बना दिया।

दादाजी का जाना 2009 में हुआ, लेकिन उनकी स्मृतियाँ आज भी हमें प्रेरणा देती हैं। उनके सत्कर्मों की गूंज आज भी परिवार और समाज दोनों में महसूस की जा सकती है। दादाजी ने अपने जीवन से यह सिखाया कि सादगी और संयम ही सबसे बड़ी शक्ति है। वे मानते थे कि जीवन का वास्तविक मूल्य दूसरों के दुःख दूर करने और अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करने में है।

आज उनका परिवार बड़ा है। चार पुत्रों, दीनदयाल भार्गव, महादेव भार्गव, सुभाषचंद्र भार्गव और लक्ष्मीचंद भार्गव की विरासत अब ग्यारह पोतों सहित परपोतों तक फैल चुकी है। इस परिवार से आज दो पार्षद, वकील, डॉक्टर, शिक्षा अधिकारी, शिक्षक और कई अन्य सदस्य विभिन्न विभागों में राजकीय सेवाओं में कार्यरत हैं। यह सब उस बीज का विस्तार है, जो दादाजी ने अपने परिश्रम और मूल्यों से बोया था।

हम सबका प्रयास यही है कि भले ही उनके पदचिन्हों पर पूर्ण रूप से न चल पाएं, परंतु उनकी मजबूत विरासत को आगे बढ़ाने में कोई कमी न रहे। उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि विरासत केवल संपत्ति का नाम नहीं, बल्कि मूल्यों, संस्कारों और आचरण का सतत प्रवाह है।

आज उनकी पुण्यतिथि पर जब हम दादाजी को स्मरण करते हैं, तो मन बार-बार उसी संकल्प से भर जाता है कि उनकी परंपरा, उनकी सादगी और उनके आदर्श कभी धुंधले न पड़ें। दादाजी केवल हमारे परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा-स्रोत रहे हैं। उनकी स्मृति को नमन करते हुए यही कहा जा सकता है, मनुष्य चला जाता है, पर उसके कर्म और आदर्श ही उसे अमर बनाते हैं। दादाजी सचमुच अमर हैं। कोटि-कोटि नमन दादाजी।
जैसा कि मुकेश भार्गव ने भटनेर पोस्ट डॉट कॉम को बताया

