


सुुचेता जैन.
एक ज़माना था जब लोग कहते थे कि हवाई यात्रा सबसे सुरक्षित है। लेकिन हाल के दिनों में जो कुछ दुनिया भर में देखने को मिल रहा है, उसने आम जनता को चिंता में डाल दिया है। ऐसा लग रहा है मानो हर कुछ दिनों में किसी देश से विमान हादसे की खबर आ रही हो। कहीं लैंडिंग के समय हादसा, कहीं टेक-ऑफ के वक्त दिक्कत, और कहीं आसमान में ही विमान गायब। ये घटनाएं अचानक बढ़ती हुई सी लग रही हैं। इंडोनेशिया, रूस, अमेरिका, ईरान, और यहां तक कि भारत में भी हाल ही में छोटे-बड़े कई विमान हादसे सामने आए हैं। कुछ मामलों में तकनीकी खराबी बताई गई, कुछ में मौसम को ज़िम्मेदार ठहराया गया, और कई हादसों की जांच अब तक जारी है। क्या यह महज़ एक इत्तेफ़ाक है? क्या विमान कंपनियाँ सुरक्षा नियमों में ढील दे रही हैं? या फिर यह अंतरराष्ट्रीय एविएशन सिस्टम की कोई गंभीर खामी है?

सोशल मीडिया पर कई लोग इन घटनाओं को किसी ‘खगोलीय परिवर्तन’ या ‘ग्रहों की चाल’ से जोड़ रहे हैं। कुछ ज्योतिषाचार्य कह रहे हैं कि ग्रहों की वर्तमान स्थिति कुछ अशुभ संकेत दे रही है और यात्रा, विशेषकर हवाई यात्रा, फिलहाल टालनी चाहिए।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भले ही इन बातों का कोई सीधा प्रमाण न हो, लेकिन जब डर मन में बैठ जाता है, तो इंसान तर्क से ज्यादा भावना पर भरोसा करने लगता है।

कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि बढ़ती घटनाओं के पीछे मेंटेनेंस प्रोटोकॉल में ढील, पुरानी तकनीक का इस्तेमाल और ट्रेंड कर्मचारियों की कमी जैसी वजहें हो सकती हैं। कई विमान कंपनियां, खासकर महामारी के बाद, घाटे से उबरने के लिए खर्चे काट रही हैं, और इसका असर सबसे पहले सुरक्षा और रखरखाव पर पड़ता है। वहीं कुछ का मानना है कि एयर ट्रैफिक का अत्यधिक दबाव, पुराने रडार सिस्टम, और एविएशन स्टाफ पर काम का बोझ भी इसकी एक वजह हो सकता है।

इन सबके बीच सबसे ज़्यादा परेशानी आम यात्रियों की है। जो लोग पहले निडर होकर फ्लाइट की टिकट बुक कर लिया करते थे, अब वह दो बार सोचने लगे हैं। खासकर जिनके परिवार में पहले कभी हादसे का अनुभव रहा हो, उनके लिए ये खबरें डर और तनाव का कारण बन रही हैं। सवाल यह भी है कि अगर हवाई यात्रा भी अब असुरक्षित हो गई, तो लोग किस पर भरोसा करें?

इन हादसों को महज़ ‘दुर्घटना’ कहकर भुला देना अब ठीक नहीं। हर बार एक प्रेस रिलीज़ आ जाती है, ‘जांच की जा रही है।’ लेकिन नतीजे कहां हैं? कौन ज़िम्मेदार है? कब तक यह सिलसिला चलेगा?

जनता को हक है जानने का, क्या उड़ानों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए जा रहे हैं? क्या पायलटों और इंजीनियरों को ठीक से ट्रेनिंग दी जा रही है? क्या पुराने विमानों को सेवा से बाहर किया जा रहा है?
डर का माहौल बनना स्वाभाविक है, लेकिन इससे निकलने का रास्ता केवल पारदर्शिता, ज़िम्मेदारी और सुधार के ठोस प्रयासों से ही निकलेगा। सरकारों, विमान कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को अब एकजुट होकर काम करना होगा, ताकि हवा में भरोसे की उड़ान दोबारा शुरू हो सके। हवाई यात्रा आज भी तेज़ और ज़रूरी माध्यम है, लेकिन जब तक सिस्टम भरोसेमंद नहीं होगा, तब तक लोगों का डर भी जायज़ रहेगा।



