



शंकर सोनी
हनुमानगढ़ जिला मुख्यालय पर 14 अगस्त को जब हर कोई जश्न-ए-आज़ादी की तैयारी में व्यस्त था, उसी सुबह जंक्शन क्षेत्र में तीन सफाईकर्मी सीवरेज चैंबर में उतरे और बेहोश हो गए। गनीमत रही कि एक पुलिसकर्मी ने उनकी पुकार सुनी, तुरंत एंबुलेंस बुलवाई और उन्हें अस्पताल पहुँचाया गया। दुर्भाग्यवश, एक मजदूर की जान नहीं बचाई जा सकी। वह व्यवस्था की लापरवाही की भेंट चढ़ गया। इस हादसे ने आमजन के मन में व्यवस्था के प्रति गहरी नाराज़गी भर दी। दो अन्य श्रमिक गंभीर अवस्था में उपचाराधीन हैं।

हनुमानगढ़ जैसे शहरों में सफाईकर्मियों को बिना किसी संसाधन और सुरक्षा उपकरण के सीवरेज चैंबर में उतारना न सिर्फ अवैधानिक है, बल्कि अमानवीय भी। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में स्पष्ट आदेश दिए हैं, फिर भी उनका पालन नहीं हो रहा।
भारत में सीवरेज सफाई के दौरान होने वाली मौतों और मैन्युअल स्कैवेंजिंग की प्रथा पर रोक लगाने के उद्देश्य से दायर जनहित याचिका डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ एवं अन्य (रिट याचिका (नागरिक) संख्या 324/2020) में सर्वाेच्च न्यायालय ने 20 अक्टूबर 2023 को ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। अदालत ने कहा ‘संविधान द्वारा प्रदत्त गरिमा, समानता और स्वतंत्रता का अधिकार तभी सार्थक है जब किसी भी व्यक्ति को असुरक्षित, अमानवीय और अपमानजनक कार्य करने के लिए मजबूर न किया जाए।’

अपने आदेश में सर्वाेच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि देशभर में मैन्युअल सीवरेज सफाई को पूरी तरह समाप्त कर मशीन आधारित, सुरक्षित तकनीक अपनाई जाए। सीवरेज सफाई में मौत होने पर मृतक के परिजनों को ₹30 लाख, स्थायी विकलांगता पर ₹20 लाख तथा अन्य विकलांगता के मामलों में ₹10 लाख मुआवज़ा दिया जाए।

मृतक के परिवार को रोजगार, बच्चों की शिक्षा हेतु छात्रवृत्ति, कौशल प्रशिक्षण और अन्य सामाजिक-आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाई जाए। एक राष्ट्रीय पोर्टल-डैशबोर्ड बनाया जाए, जिसमें मौतों, मुआवज़ा भुगतान और पुनर्वास की स्थिति दर्ज हो।
राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में सर्वेक्षण समितियों का गठन किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. भीमराव आंबेडकर का उद्धरण देते हुए कहा कि यह संघर्ष केवल आर्थिक या भौतिक हितों का नहीं, बल्कि मानव व्यक्तित्व की पुनर्स्थापना का है। साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेशों का पालन न करने वाले अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई संभव है।

गौरतलब है कि सर्वाेच्च न्यायालय ने 2014 में भी सफाई कर्मचारी आंदोलन मामले में आदेश दिए थे कि किसी आपात स्थिति में भी बिना सेफ़्टी गियर के सीवरेज में प्रवेश अपराध माना जाएगा। लेकिन 20 अक्टूबर 2023 के आदेश की पालन न करने पर सुप्रीम कोर्ट ने 18 दिसंबर 2024 को कड़ी नाराज़गी जताई और अगली सुनवाई में अनुपालन रिपोर्ट माँगने के साथ ही अवमानना की कार्रवाई की चेतावनी दी।

दुःख का विषय है कि सर्वाेच्च न्यायालय के आदेशों की केंद्रीय सरकार, राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय, यहाँ तक कि न्यायालय और पुलिस भी परवाह नहीं करते। सफाईकर्मियों में अधिकांश वाल्मीकि समाज या अनुसूचित जाति के सदस्य होते हैं। शिक्षा और जागरूकता के अभाव में वे अपने पक्ष में पारित आदेशों का लाभ उठाने में सक्षम नहीं हो पाते। जनप्रतिनिधियों में भी इतना नागरिक बोध नहीं दिखता कि वे पीड़ितों को न्याय दिला सकें।
-लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता एवं नागरिक सुरक्षा मंच के संस्थापक हैं


