





मनीष जांगिड़.
स्वर्ण, यानी सोना। एक धातु जो सिर्फ़ अपने पीले रंग और चमक के कारण नहीं, बल्कि संस्कृति, भावनाओं और आर्थिक सुरक्षा के प्रतीक के रूप में भी अनादि काल से हमारे जीवन में शामिल है। भारतीय समाज में ‘सोने जैसा आदमी’, ‘सोने जैसी ज़ुबान’ जैसे मुहावरे इसी के महत्व और श्रेष्ठता को दर्शाते हैं। शादी-ब्याह, धार्मिक आयोजनों, पर्व-त्योहारों और निवेश, हर जगह सोना अपनी उपस्थिति दर्ज कराता आया है।
सोना सदियों से लेनदेन, शक्ति और प्रतिष्ठा का साधन रहा है। कभी स्वर्ण मुद्राएँ बाज़ार का आधार हुआ करती थीं, तो कभी राजाओं और साम्राज्यों के ख़ज़ाने का मापदंड। परंपरागत नाप ‘तोला’ आज भी बोलचाल में चलता है, जिसका भार 11.6638 ग्राम होता है। यह माप दशकों से सोने की कीमत और उसकी तुलना समझने के लिए अहम है।

1925 में भारत में सोने की कीमत लगभग ₹18.75 प्रति 10 ग्राम थी। उस समय के जीवनस्तर, वेतन और आवश्यकताओं के हिसाब से यह राशि भी एक साधारण परिवार के लिए बड़ी थी, लेकिन आज के मुकाबले बेहद सस्ती मानी जाएगी। सोना तब भी एक सुरक्षित निवेश और प्रतिष्ठा का प्रतीक था। जानकारी के मुताबिक, 1996-97 में सोने का भाव लगभग ₹3,800-4,000 प्रति 10 ग्राम था। यह स्थानीय दुकानों के भाव और व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित था।

हालांकि, आधिकारिक औसत आंकड़ों के अनुसार 1996 में 24 कैरट सोने की औसत कीमत ₹5,160 प्रति 10 ग्राम थी। यहाँ यह फर्क समझना ज़रूरी है कि सालाना औसत और किसी विशेष दिन या शहर के भाव अलग हो सकते हैं। उस समय एक कहावत प्रचलित थी, ‘एक तोला सोना एक महीने का खर्च’। अगर इस विचार को देखें, तो 1996 में लगभग ₹4,000-5,000 में एक परिवार का मासिक खर्च चल जाता था। तब न मोबाइल था, न इंटरनेट का बिल, न पेट्रोल-वाहन का खर्च। जीवनशैली अपेक्षाकृत सादी थी।

2025 में नए रिकॉर्ड, नई मुश्किलें
अगस्त 2025 में 24 कैरट सोने की कीमत ₹1,00,700-1,02,000 प्रति 10 ग्राम के बीच रही। यह अब तक का एक ऐतिहासिक स्तर है। यानी, 1996 के औसत ₹5,160 से आज तक सोना लगभग 19.5 गुना महँगा हो चुका है। अगर हम इसे वार्षिक औसत वृद्धि दर में बदलें तो यह करीब 10.8ः प्रतिवर्ष बैठती है, जो किसी भी सुरक्षित निवेश के लिए बेहतरीन मानी जाती है। सोने में निवेश करने वाले को इसके लिए किसी सक्रिय प्रबंधन की ज़रूरत नहीं पड़ी, समय ने ही उसका मूल्य बढ़ा दिया।
यहीं पर असली चुनौती आती है। पहले जहाँ मध्यम आय वर्ग के लोग शादी-ब्याह, त्योहारों या बचत के रूप में आराम से सोना खरीद पाते थे, वहीं अब इसकी कीमत इतनी बढ़ गई है कि आम आदमी के लिए 10 ग्राम सोना खरीदना भी मुश्किल हो गया है। इसके पीछे सिर्फ़ सोने की बढ़ती कीमत ही कारण नहीं है, बल्कि बदलती जीवनशैली और महँगाई भी जिम्मेदार हैं। मोबाइल, इंटरनेट, वाहन, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन और यात्रा। ये सारे नए खर्च पहले के जीवन में न के बराबर थे, लेकिन अब घरेलू बजट का बड़ा हिस्सा इन पर जाता है।
आज भले ही कोई ₹1,00,000 प्रतिमाह कमा ले, लेकिन घर के खर्च, ईएमआई और अन्य ज़रूरतें पूरी करने के बाद सोना खरीदना पहले जैसा आसान नहीं है। सोना सिर्फ़ आभूषण नहीं, बल्कि एक मुद्रास्फीति से सुरक्षा का माध्यम है। आर्थिक संकट, युद्ध, या वैश्विक अस्थिरता के समय सोना अक्सर अपनी कीमत बनाए रखता है, जबकि शेयर बाज़ार और अन्य निवेश साधन गिर सकते हैं। हालाँकि, इसमें तरलता की कमी होती है, यानी अचानक ज़रूरत पड़ने पर इसे बेचने में समय लग सकता है, और मेकिंग चार्ज/कर जैसे खर्च भी लगते हैं।

इतिहास बताता है कि सोने का दीर्घकालिक रुझान ऊपर की ओर रहा है। हालांकि, इसमें उतार-चढ़ाव भी आते हैं। आने वाले वर्षों में इसकी कीमत और बढ़ सकती है। खासकर अगर वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता बनी रहती है। डिजिटल गोल्ड, और सोवरेन गोल्ड बॉन्ड जैसे विकल्प आम निवेशकों के लिए सोने में निवेश का आसान, सुरक्षित और टैक्स-फायदे वाला तरीका दे रहे हैं। सोना सदियों से भरोसे का पर्याय रहा है और आज भी है। 1925 के ₹18.75 से लेकर 1996 के ₹5,160 और अब 2025 के ₹1,00,700, यह सफ़र दिखाता है कि समय के साथ इसका मूल्य कई गुना बढ़ा है। पर साथ ही यह भी सच है कि अब यह आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है। बदलते समय में हमें सोने को सिर्फ़ आभूषण नहीं, बल्कि सोच-समझकर किया गया एक दीर्घकालिक निवेश मानना होगा, और ज़रूरत पड़े तो इसके आधुनिक डिजिटल विकल्पों पर भी ध्यान देना होगा।

