



मोहम्मद मुश्ताक.
एक समय था जब हम अपने अतीत पर गर्व करते थे। हमारे बुजुर्गों की बातें, उनके अनुभव और समझदारी हमें गौरव से भर देती थी। गांव की चौपाल से लेकर शहर की गलियों तक, अतीत की कहानियां ज्ञान और प्रेरणा का स्रोत हुआ करती थीं। मगर अब समय बदल गया है। आजकल राष्ट्रीय फैशन बन गया है, अतीत को कोसना, जैसे वो कोई पुराना अपराधी हो, जिसे हर नई पीढ़ी एक बार ज़रूर गाली देती है। इसी प्रवृत्ति की एक बानगी इन दिनों हनुमानगढ़ में दिखाई दे रही है। बरसात हुई नहीं कि शहर में सोशल मीडिया पर ‘आंधी’ आ जाती है। हर तरफ़ बस एक ही सवाल? ‘करोड़ों रुपये खर्च के बावजूद शहर में जलनिकासी की समस्या क्यों है?’ अब कुछ उत्साही सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर, जिनकी ‘रिंग लाइट’ के बिना सुबह नहीं होती और कुछ मूर्धन्य पत्रकार, जिन्हें हर मुद्दे में ब्रेकिंग न्यूज़ चाहिए, इस प्रश्न को लेकर बहुत ही गंभीर दिख रहे हैं। रोज़ाना वीडियो, स्टोरी और लाइव अपडेट्स के ज़रिए बरसात को राष्ट्रीय आपदा बनाने में लगे हुए हैं।

पर क्या किसी ने कभी जानने की कोशिश की कि ये समस्या है क्या और क्यों है? ज़रा अतीत में झांकिए, आपको जवाब खुद मिल जाएगा। जहां आज मिनी सचिवालय है, नई धान मंडी है, शिवमंदिर एरिया है, पुरानी कचहरी है या पुलिस थाना, ये सब वो इलाके हैं जिन्हें पुराने लोग ‘डब्बर’ कहा करते थे। ‘डब्बर’ यानी वह स्थान जहाँ वर्षा जल सदियों से एकत्र होता आया है। यह इलाका पहले खुंजा गांव का हिस्सा था और प्राकृतिक तौर पर जलभराव का क्षेत्र था। मतलब साफ़ है, आपने तालाब में इमारत बना दी और अब शिकायत कर रहे हैं कि उसमें पानी क्यों भरता है! बात इतनी सीधी है कि अगर आप नदी के रास्ते में दीवार खड़ी करेंगे तो पानी नाराज़ नहीं होगा, वह अपना रास्ता खुद बना लेगा, कभी आपके ड्राइंग रूम से, कभी आपके तहखाने से।
साल 1998 और 2000 तक के दृश्य आज भी पचास-साठ पार के लोगों के जेहन में ताज़ा हैं। तब जब बारिश होती थी तो पुलिस थाना, कचहरी और पुराना कोर्ट परिसर पानी में डूब जाता था। होमगार्ड और डीएसपी कार्यालय की जगह सिर्फ़ जलकुंड नजर आता था। वकील लोग जिन टप्पर-झोंपड़ियों में बैठते थे, वहां तक पहुंचना युद्ध जितने जैसा होता था।
एक बार तो लोकल बस के टायरों से कीचड़ के छींटे किसी वरिष्ठ अधिवक्ता पर पड़ गए और पूरी वकील बिरादरी हड़ताल पर चली गई थी। वो दिन भी देखे हैं हमने, जब लोकल समस्याएं लोकल स्तर पर हल होती थीं, और मीडिया की भूमिका ‘समाचार’ तक सीमित थी।

अब आते हैं असल मुद्दे पर, यह सब क्यों हो रहा है? क्या प्रशासन नकारा है? क्या इंजीनियर अनपढ़ हैं? क्या नेता लापरवाह हैं? या फिर हमारी नगर नियोजन की नींव ही ग़लत रखी गई? असल दोष नगर नियोजन विभाग का है, जिसने प्राकृतिक जलधारण क्षेत्रों की अनदेखी करते हुए केवल नक्शों और लाभ के आधार पर प्लान पास कर दिए। 1958 में जब हनुमानगढ़ को नगर घोषित किया गया और ‘शहरीकरण’ की शुरुआत हुई, तब की गई गलतियों को हमने सुधारा नहीं, बस उन्हें नए नाम दे दिए, मास्टर प्लान, आवासीय कॉलोनियां, मिनी सचिवालय, न्यायालय परिसर आदि।

2000 के बाद जो मास्टर प्लान बना, उसने ‘नाथों के डेरे का जोहड़’, ‘सरपालर जोहड़’, ‘खुंजा और सुरेशिया के पायतन’ जैसे पारंपरिक जलभराव क्षेत्रों को मिटा दिया। इन क्षेत्रों में मकान, दुकान, सरकारी भवन, कॉलोनियां और पार्क बन गए। डब्बर की छाती पर बसा मिनी सचिवालय आज हर बारिश में गीले जूतों से कराह उठता है। अब सवाल यह नहीं है कि पानी क्यों भरता है, सवाल यह है कि हम उसे रोकना भी चाहते हैं या सिर्फ़ रील्स बनाकर ‘हाय हाय प्रशासन’ की प्रैक्टिस करना चाहते हैं।
हर वर्ष बरसात में दोष देने की होड़ लग जाती है। प्रशासन, विधायक, नगर परिषद, इंजीनियर, यहां तक कि बादलों तक को हम बख्शते नहीं। पर कोई ये नहीं कहता कि क्या हमने शहर के ‘अभिनव नगर नियोजन’ की समीक्षा की? क्या 70 साल की गलतियों का पोस्टमार्टम किया गया? क्या कोई समाधान निकाला गया?

अब समय आ गया है कि हम आरोप और आलोचना से आगे बढ़ें। मीडिया को चाहिए कि वह समस्या के मूल तक जाए, केवल वीडियो नहीं बल्कि समाधान भी पेश करे। सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर को कैमरे से हटकर किताबों में झांकना चाहिए, शायद उन्हें ‘अर्बन प्लानिंग’ की कोई उपयोगी जानकारी मिल जाए। प्रशासन को चाहिए कि वह इस अंधाधुंध विकास की ‘रीप्लानिंग’ करे। पुराने जल-प्रवाह क्षेत्रों को चिह्नित कर वहां ‘रेन वाटर हार्वेस्टिंग पार्क’, ‘सोकपिट ज़ोन’ और ‘जल पुनर्भरण क्षेत्र’ बनाए जाएं। भविष्य की कोई पीढ़ी यह न कहे कि “हमारे पूर्वजों ने शहर को डुबोने की व्यवस्था बहुत अच्छी बनाई थी।”
कुल मिलाकर, बारिश को दोष देना आसान है, पर असली बहादुरी तो तब दिखेगी जब हम स्वीकार करेंगे कि दोष हमारे अपने निर्णयों का है और फिर उन्हें सुधारने की ठोस पहल करेंगे। कहीं ऐसा न हो कि अगले 70 साल बाद हमारी अगली पीढ़ी यही सवाल दोहराए, ‘इतना पानी क्यों भरता है?’ और हम, अतीत की तरह, बस जवाब देने के लिए न हों।
-लेखक जिला उपभोक्ता होलसेल भंडार के चेयरमैन व पेशे से अधिवक्ता हैं


